Story by Kanhaiya Mishra Prabhakar

पाप के चार हथियार – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ‘



लेखक परिचय : कन्हैयालाल मिश्र जी का जन्म २६ सितंबर १ ९ ०६ को उत्तर प्रदेश के देवबंद गाँव में हुआ । आप हिंदी के कथाकार , निबंधकार , पत्रकार तथा स्वतंत्रता सेनानी थे ।

आपने पत्रकारिता में स्वतंत्रता के स्वर को ऊँचा उठाया । आपके निबंध भारतीय चिंतनधारा को प्रकट करते हैं । आपका संपूर्ण साहित्य मूलत : सामाजिक सरोकारों का शब्दांकन है ।

आपने साहित्य और पत्रकारिता को व्यक्ति और समाज के साथ जोड़ने का प्रयास किया है । आप भारत सरकार द्वारा ‘ पद्मश्री ‘ सम्मान से विभूषित हैं ।

आपकी भाषा सहज – सरल और मुहावरेदार है जो कथ्य को दृश्यमान और सजीव बना देती है ।

तत्सम शब्दों का प्रयोग भारतीय चिंतन – मनन को अधिक प्रभावशाली बनाता है । आपका निधन १ ९९ ५ में हुआ ।

प्रमुख कृतियाँ : ‘ धरती के फूल ‘ ( कहानी संग्रह ) , ‘ जिंदगी मुस्कुराई ‘ , ‘ बाजे पायलिया के घुघरू ‘ , ‘ जिंदगी लहलहाई ‘ , ‘ महके आँगन – चहके द्वार ‘ ( निबंध संग्रह ) , ‘ दीप जले , शंख बजे ‘ , ‘ माटी हो गई सोना ‘ ( संस्मरण एवं रेखाचित्र ) आदि ।

विधा परिचय : निबंध का अर्थ है – विचारों को भाषा में व्यवस्थित रूप से बाँधना । हिंदी साहित्यशास्त्र में निबंध को गद्य की कसौटी माना गया है ।

निबंध विधा में जो पारंगत है वह गद्य की अन्य विधाओं को सहजता से लिख सकता है ।

निबंध विधा में वैचारिकता का अधिक महत्त्व होता है तथा विषय को प्रखरता से पाठकों के सम्मुख रखने की सामर्थ्य होती है ।

पाठ परिचय : प्रत्येक युग में विचारकों , दार्शनिकों , संतों – महापुरुषों ने पाप , अपराध , दुष्कर्मों से मानवजाति को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया परंतु विडंबना यह है कि आज भी विश्व में अन्याय , अत्याचार , भ्रष्टाचार , पाप और दुष्कर्मों का बोलबाला है और मनुष्य जाने – अनजाने इन्हीं का समर्थक बना हुआ है ।

समाज संतों – महापुरुषों की जयंतियाँ मनाता है . जय – जयकार करता है , उनके स्मारकों का निर्माण करवाता है परंतु उनके विचारों को आचरण में नहीं उतारता । ऐसा क्यो होता है ?

लेखक ने अपने चिंतन के आधार पर इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास प्रस्तुत निबंध में किया है ।

Shuruwaat:

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का एक पैराग्राफ मैंने पढ़ा है । वह उनके अपने ही संबंध में है : “ मैं खुली सड़क पर कोड़े खाने से इसलिए बच जाता हूँ कि लोग मेरी बातों को दिल्लगी समझकर उड़ा देते हैं ।

बात यूँ है कि मेरे एक शब्द पर भी वे गौर करें , तो समाज का ढाँचा डगमगा उठे । “ वे मुझे बर्दाश्त नहीं कर सकते , यदि मुझपर हँसें नहीं । मेरी मानसिक और नैतिक महत्ता लोगों के लिए असहनीय है ।

उन्हें उबाने वाली खूबियों का पुंज लोगों के गले के नीचे कैसे उतरे ?

इसलिए मेरे नागरिक बंधु या तो कान पर उँगली रख लेते हैं या बेवकूफी से भरी हँसी के अंबार के नीचे ढंक देते हैं मेरी बात ।

” शॉ के इन शब्दों में अहंकार की पैनी धार है , यह कहकर हम इन शब्दों की उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि इनमें संसार का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सत्य कह दिया गया है । 

संसार में पाप है , जीवन में दोष , व्यवस्था में अन्याय है , व्यवहार में अत्याचार … और इस तरह समाज पीड़ित और पीड़क वर्गों में बँट गया है ।

सुधारक आते हैं , जीवन की इन विडंबनाओं पर घनघोर चोट करते हैं ।

विडंबनाएँ टूटती – बिखरती नजर आती हैं पर हम देखते हैं कि सुधारक चले जाते हैं और विडंबनाएँ अपना काम करती रहती हैं ।

आखिर इसका रहस्य क्या है कि संसार में इतने महान पुरुष , सुधारक , तीर्थंकर , अवतार , संत और पैगंबर आ चुके पर यह संसार अभी तक वैसा – का – वैसा ही चल रहा है । इसे वे क्यों नहीं बदल पाए ?

दूसरे शब्दों में जीवन के पापों और विडंबनाओं के पास वह कौन – सी शक्ति है जिससे वे सुधारकों के इन शक्तिशाली आक्रमणों को झेल जाते हैं और टुकड़े – टुकड़े होकर बिखर नहीं जाते ?

शॉ ने इसका उत्तर दिया है कि मुझपर हँसकर और इस रूप में मेरी उपेक्षा करके वे मुझे सह लेते हैं ।

यह मुहावरे की भाषा में सिर झुकाकर लहर को ऊपर से उतार देना है । शॉ की बात सच है पर यह सच्चाई एकांगी है । सत्य इतना ही नहीं है ।

पाप के पास चार शस्त्र हैं , जिनसे वह सुधारक के सत्य को जीतता या कम – से – कम असफल करता है ।

मैंने जीवन का जो थोड़ा – बहुत अध्ययन किया है , उसके अनुसार पाप के ये चार शस्त्र इस प्रकार हैं :

उपेक्षा , निंदा , हत्या और श्रद्धा ।

सुधारक पापों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद करता है तो पाप और उसका प्रतिनिधि पापी समाज उसकी उपेक्षा करता है , उसकी ओर ध्यान नहीं देता और कभी – कभी कुछ सुन भी लेता है तो सुनकर हँस देता है जैसे वह किसी पागल की बड़बड़ हो , प्रलाप हो ।

इन क्षणों में पाप का नारा होता है , ” अरे , छोड़ो इसे और अपना काम करो । ”

सुधारक का सत्य उपेक्षा की इस रगड़ से कुछ तेज होता जाता है , उसके स्वर अब पहले से कुछ पैने हो जाते हैं और कुछ ऊँचे भी अब समाज का पाप विवश हो जाता है कि वह सुधारक की बात सुने ।

वह सुनता है और उसपर निंदा की बौछारें फेंकने लगता है । सुधारक , सत्य और समाज के पाप के बीच यह गालियों की दीवार खड़ी करने का प्रयत्न है ।

जीवन अनुभवों का साक्षी है कि सुधारक के जो जितना समीप है , वह उसका उतना ही बड़ा निंदक होता है । यही कारण है कि सुधारकों को प्राय : क्षेत्र बदलने पड़े हैं ।

इन क्षणों में पाप का नारा होता है : “ अजी बेवकूफ है। , लोगों को बेवकूफ बनाना चाहता है । ” सुधारक का सत्य निंदा की इस रगड़ से और भी प्रखर हो जाता है । अब उसकी धार चोट ही नहीं करती , काटती भी है ।

पाप के लिए यह चोट धीरे – धीरे असह्य हो उठती है और वह बौखला उठता है । अब वह अपने सबसे तेज शस्त्र को हाथ में लेता है ।

यह शस्त्र है हत्या । सुकरात के लिए यह जहर का प्याला है , तो ईसा के लिए सूली , दयानंद के लिए यह पिसा काँच है । इन क्षणों में पाप का नारा होता है , ” ओह , मैं तुम्हें खिलौना समझता रहा और तुम साँप निकले । पर मैं साँप को जीता नहीं छोडूंगा – पीस डालूँगा । “

सुधारक का सत्य हत्या के इस घर्षण से प्रचंड हो उठता है । शहादत उसे ऐसी धार देती है कि सुधारक के जीवन में उसे जो शक्ति प्राप्त न थी , अब वह हो जाती है ।

सूर्यों का ताप और प्रकाश उसमें समा जाता है , बिजलियों की कड़क और तूफानों का वेग भी ।

पाप काँपता है और अब उसे लगता है कि इस वेग में वह पिस जाएगा – बिखर जाएगा । तब पाप अपना ब्रह्मास्त्र तोलता है और तोलकर सत्य पर फेंकता है । यह ब्रह्मास्त्र है – श्रद्धा ।

इन क्षणों में पाप का नारा होता है – 

“ सत्य की जय ! अब वह सुधारक की करने लगता है चरणवदना और सुधारक होता है करुणाशील और उसका सत्य सरल यह नारा ऊँचा उठता रहता है , अधिक – से – अधिक दूर तक उसकी गूंज फैलती रहती है , लोग उसमें शामिल होते रहते हैं ।

पर अब सबका ध्यान सुधारक में नहीं ; उसकी सुधारक की जय ! ” उसके सत्य की महिमा का गान और बखान । विश्वासी ।

वह पहले चौंकता है , फिर कोमल पड़ जाता है और तब उसका वेग बन जाता है शांत और वातावरण में छा जाती है सुकुमारता ।

पाप अभी तक सुधारक और सत्य के जो स्तोत्र पढ़ता जा रहा था , उनका करता है यूँ उपसंहार “ सुधारक महान है , वह लोकोत्तर है , मानव नहीं , वह तो भगवान है , तीर्थंकर है , अवतार है , पैगंबर है , संत है ।

उसकी वाणी में जो सत्य है , वह स्वर्ग का अमृत है । वह हमारा वंदनीय है , स्मरणीय है , पर हम पृथ्वी के साधारण मनुष्यों के लिए वैसा बनना असंभव है , उस सत्य को जीवन में उतारना हमारा आदर्श है , पर आदर्श को कब , कहाँ , कौन पा सकता है ? ”

और इसके बाद उसका नारा हो जाता है , 

 महाप्रभु सुधारक वंदनीय है , उसका सत्य महान है , वह लोकोत्तर है । “

यह नारा ऊँचा उठता रहता है , अधिक – से – अधिक दूर तक उसकी गूंज फैलती रहती है , लोग उसमें शामिल होते रहते हैं ।

पर अब सबका ध्यान सुधारक में नहीं ; उसकी लोकोत्तरता में समाया रहता है , सुधारक के सत्य में नहीं , उसके सूक्ष्म – से – सूक्ष्म अर्थों और फलितार्थों के करने में जुटा रहता है ।

अब सुधारक के बनने लगते हैं स्मारक और मंदिर और उसके सत्य के ग्रंथ और भाष्य । बस यहीं सुधारक और उसके सत्य की पराजय पूरी तरह हो जाती है ।

पाप का यह ब्रह्मास्त्र अतीत में अजेय रहा है और वर्तमान में भी अजेय है ।

कौन कह सकता है कि भविष्य में कभी कोई इसकी अजेयता को खंडित कर सकेगा या नहीं ?

( ‘ बाजे पायलिया के घुघरू ‘ निबंध संग्रह से )

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