Gautam Buddha Teachings | Life Story (Part 3)

  Devotional Hindi Gautama Buddha Stories Mushkil Samay  (Part 3) 

Sabse Bhadiya Kahaniya | नमस्कार दोस्तों आशा है आप सब अच्छे होंगे। यह series Gautama Buddha की पूरी जीवन पर है। हर article मैं  20 कहानियाँ (stories) होंगी।  और यह कहानियाँ आपको बुद्ध (Buddha) भगवान के चरित्र और उनके कर्तव्य क बारे मैं बताएंगी। 

यह तीसरा PART है। यह कहानियाँ मैंने छोटे मैं समझाने का प्रयास किया है ताकि आप छोटे मैं हे बहुत कुछ समज सके। 
तो बिना कोई देर किये चैलिये शुरू करते है।

और पढ़े: Gautam Buddha Life Story Part 1 
               Gautam Buddha Life Story Part 2  

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४१. भरपूर निंदा 

भगवान ने उरुवेल के तीनों काश्यप बंधुओं को और उनके एक हजार जटिल संन्यासी शिष्यों को अपना अनुयायी बना लिया। तब अंग देश में रहने वाले इन काश्यप बंधुओं के जो भक्त थे उन्हें गहरी चोट लगी। सारिपुत्त और मोग्गल्लान भी भगवान के शिष्य हुए। उनके साथ २५० अन्य शिष्य भी अपने आचार्य को छोड़ कर भगवान के अनुयायी हो गये। यह भी कुछ एक राजगीर निवासियों को सहन नहीं हुआ। जब भिक्षु भिक्षाटन के लिए निकलते तब वे लोग भगवान को खरी-खोटी सुनाते।

श्रमण गौतम सधवाओं को विधवा, सपूतियों का निपूती बनाने आया है। कुलों का नाश करने यहां आया है। भिक्षु भगवान से इस निंदा की चर्चा करते। भगवान उन्हें शांत रहने की शिक्षा देते। विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी जब रंचमात्र मा विचलित न होकर धीरज और सहनशीलता कायम रखे, तब फल मीठा ही होता है। भगवान के सभी शिष्य विपश्यना के कारण अविचलचित्त रहने में निपुण हुए।

४२. निंदा-प्रशंसा 

एक बार भगवान अपने भिक्षु संघ के साथ राजगीर से नालंदा की ओर यात्रा कर रहे थे। उनके साथ पीछे-पीछे परिव्राजक सुप्रिय अपने शिष्य ब्रह्मदत्त माणवक के साथ चला आ रहा था। सारे रास्ते सुप्रिय भगवान बुद्ध की निंदा करता रहा और माणवक भिन्न-भिन्न प्रकार से भगवान की प्रशंसा करता रहा। नालंदा पहुँचने के पहले सायंकाल होते ही इन यात्रियों को अंकित नामक गांव की बड़ी धर्मशाला में रात गुजारनी पड़ी। वहां भी भिक्षु संघ ने देखा कि सारी रात इन दोनों का वही निंदा-स्तुति का वार्तालाप चलता रहा। भिक्षुओं ने उस बहस में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया।

भोर होते ही उन्होंने भगवान को बताया कि किस प्रकार दोनों गुरु-शिष्य सारे रास्ते और फिर सारी रात निंदा-स्तुति में ही लगे रहे। भगवान ने कहा इस निंदा-स्तुति की वार्ता में तुम निर्लिप्त रहे, यही उचित था। बुद्ध धर्म और संघ की निंदा सुन कर कुपित हो जाते और प्रशंसा सुन कर फूल उठते तब अपनी ही हानि कर लेते। दोनों अवस्थाओं में समता में स्थित रहना ही धर्म था। जीवन में निंदा-स्तुति, यश-अपयश, जय पराजय, हानि-लाभ इन आठ प्रकार के लोकधर्मों का संपर्क होता ही रहता है। लेकिन इनसे जिसका चित्त विचलित नहीं होता, जो प्रज्ञापूर्ण समता में स्थित रहता है, उसका उत्तम मंगल ही होता है।

४३. कपिलवस्तु 

आगमन जब महाराज शुद्धोदन ने सुना कि उसका पुत्र सम्यक संबुद्ध बन गया है और लोगों का महान कल्याण कर रहा है तब उसने अपने पुत्र को कपिलवस्तु बुलवाया। भगवान अपने बड़े भिक्षु संघ के साथ कपिलवस्तु पहुँचे और दूसरे दिन नगर-निवासियों को संघवाद का पुण्य देने के लिए घर-घर गोचरी करते हुए निकले। पिता शुद्धोदन ने यह सुना तो व्याकुल हुआ और स्वयं जाकर पुत्र को संघ सहित राजमहल में ले आया। वहां सब को आदरपूर्वक भोजन करवाया। रनिवास के सभी सदस्य भगवान को नमस्कार करने आये। केवल यशोधरा नहीं आयी। उसने कहला भेजा कि यदि मुझमें गुण होंगे तो आर्यपुत्र स्वयं मेरे निवास पर आयेंगे, तभी मैं उनकी वंदना करूंगी। यशोधरा का जीवन आदर्श जीवन था। वह जानती थी कि सम्यक संबुद्ध बनने के लिए ही उसके पति ने गृहत्याग किया है। अतः उसे इस पर जरा भी क्रोध नहीं आया। कभी विलाप नहीं किया। कभी व्याकुल नहीं हुई। धन्य है यशोधरा!

४५. राहुल

 राहुल माता यशोधरा ने राहुल को उसके पिता का परिचय दिया। उसका पूर्व पति अपने महान उद्देश्य की पूर्ति करके राजनगर लौटा है, यह देख कर उसका हृदय प्रफुल्लता से भरा है। इसी प्रफुल्ल हृदय से उसने अपने पुत्र राहुल को उसके अनदेखे पिता का परिचय दिया। उसके रंग-रूप सौंदर्य का वर्णन करते हुए अंत में कहा सील समाधिपतितिचित्तो- उसका चित्त शील, समाधि में भली प्रकार प्रतिष्ठित है। सावकमज्झगतो समणिन्दो- वह श्रमण-श्रावकों के मध्य गतिमान है। लोकहिताय गतो नरवीरो- वह नरों में वीर है जिसने लोकहित के लिए गृह त्याग किया था। एस हि तुम्ही पिता नरसीहो- ऐसा है तेरा यह पिता जो नरों में सिंह के समान है। धर्ममयी माता के हर्षोद्गार की यह वाणी पालि वाङ्मय में उत्कृष्टतम मानी जाती है।

४६. राहुल की प्रव्रज्या

ममतामयी माता यशोधरा ने अपने पुत्र राहुल को उसके पिता का परिचय देने के बाद कहा कि उसके पास जाकर विरासत मांगे। वह खूब जानती थी कि भगवान के पास शुद्ध धर्म के अतिरिक्त और क्या विरासत होगी! यशोधरा स्वयं चाहती थी कि वह भी भिक्षुणी बन कर भगवान के बताये हुए मार्ग का लाभ उठाये। परंतु तब भिक्षुणीसंघ की स्थापना नहीं हुई थी। अतः अपने पुत्र को उसका लाभ लेने के लिए प्रेरित किया। राहुल जब भगवान के समीप पहुँचा तब उसने कहा, ‘श्रमण तेरी छाया सुखद है। भगवान की छत्रछाया किसको सुखद नहीं लगती! भगवान ने उसे विरासत के रूप में धर्म दिया। वह प्रव्रजित हुआ। बड़ा होकर विपश्यना का अभ्यास करता हुआ, अरहंत अवस्था प्राप्त कर मुक्त हुआ। धन्य हुई राहुल को मिली विरासत।

४७. सात प्रव्रजित

जब भगवान कपिलवस्तु के लोगों को धर्मदेशना देकर वहां से चले तो राजकुमार अनुरुद्ध, राजकुमार भद्दिय, राजकुमार आनंद, राजकुमार भगु, राजकुमार किमिल और देवदत्त तथा उपालि नाई, इन सब ने भगवान से प्रव्रज्या ली। धर्मदेशना से अभिभूत राजकुमारों ने नम्रता दिखाते हुए उपालि नाई को पहले प्रव्रजित करवाया ताकि वह संघ में उनका ज्येष्ठ रहे। देवदत्त को छोड़ कर बाकी सब का कल्याण हुआ। वे खूब समझ गये कि कोई बुद्ध मोक्षदाता नहीं होता, मार्गदाता होता है। उन्होंने उसके बताये मार्ग पर चल कर अपना कल्याण कर लिया। देवदत्त ने विपश्यना नहीं सीखी। केवल ध्यान सीखा। उसका लक्ष्य मुक्ति नहीं, बल्कि सिद्धियां प्राप्त करना था। वह इसी से संतुष्ट हो गया।

४८. अनाथपिंडक

 श्रावस्ती का श्रेष्ठी अनाथपिंडक जो राजगीर में अपनी ससुराल गया तब सौभाग्य से उसका भगवान बुद्ध से संपर्क हुआ। उसने संघ सहित उन्हें भोजनदान दिया और फिर उनसे प्रार्थना की कि वे अपना अगला वर्षावास श्रावस्ती में बताएं। भगवान की स्वीकृति पाकर वह श्रावस्ती लौटा और उनके अनुकूल विहार के लिए स्थान खोजने लगा। उसने राजकुमार जेत के उपवन को उपयुक्त पाया।

परंतु उसके लिए उसे सारी जमीन पर सोने के सिक्के बिछा कर कीमत चुकानी पड़ी। जहां भगवान लोगों को धर्म सिखायेंगे, उस धरती की कोई क्या कीमत आंक सकता है! धन्य है अनाथपिंडक, जिसने जेतवन की उस धरती पर विहार बना कर संघको दिया, जहाँ भगवान ने अनेक वर्षावास बिताये और लोगों का कल्याण किया। उसने यह बहुमूल्य दान अपनी प्रसिद्धि या व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं दिया, बल्कि लोक कल्याण के लिए दिया। इसीलिए यह दान अतुलनीय माना गया।

४९. उत्तम ब्राह्मण सुनीत

भगवान प्रातःकाल मगध की राजधानी राजगीर की ओर गोरी के लिए जा रहे थे। सामने भंगी संगीत कमर झुकाये, हाथ में झाडू लिए सड़क बिहार रहा था। देखा कि भगवान आ रहे हैं तब संकोच के मारे एक और हट गया। कहीं मुझ जैसे अछूत की छाया भी उन्हें स्पर्श न कर ले। पर भगवान तो भगवान थे।

समाज की इस दूषित प्रथा के विरोधी थे। उन्होंने पुकारा, आओ सुनीता! सुनीत भावविभोर हो उठा। उसने भिक्षु बनने की प्रार्थना की। भगवान ने उसे भिक्षु बनाया और विपश्यना की विद्या सिखायी। ध्यान करते-करते वह मुक्त हुआ। अरहंत हुआ और सही माने में उत्तम ब्राह्मण हुआ। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता, कर्म से ही ब्राह्मण होता है।

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५०. सोपाक

सोपाक चांडाल कुल में जन्मा । चार माह की अवस्था में अनाथ हो गया। चाचा ने उसे बोझ समझकर ही पाला और एक दिन क्रुद्ध हो गया तब उसे श्मशान ले जाकर एक मुर्दे के साथ बांध दिया। बच्चे के करुण क्रंदन का उस पर कोई असर नहीं हुआ। परंतु भगवान ने यह घटना देखी तो करुणा-विगलित होकर कुछ भिक्षुओं को भेजा और उसे छुड़ा लाये। भगवान ने उसे प्रव्रज्या दी और फिर उपसंपदा दी।

आगे चल कर सोपाक विपश्यना करते-करते अरहंत हो गया। उसकी मां उससे मिलने आयी तब भगवान की वाणी सुनते-सुनते उसमें भी विपश्यना जागी और वह स्रोतापन्न हो गयी। धर्म में कोई जातिवाद नहीं होता। किसी भी जाति या कुल में जन्मा कोई भी व्यक्ति धर्म का अभ्यास करे तो पूज्य हो जाता है। सोपाक भी पूज्य हुआ।

५१. दासी खुज्जुत्तरा

खुज्जुत्तरा कौशांबी की महारानी श्यामावती की क्रीतदासी थी। वह प्रतिदिन रानी के लिए फूल खरीदकर लाती और उसमें से कुछ पैसे अपने लिए बचा लेती। एक दिन नगर में भगवान बुद्ध का उपदेश सुना। सुनते-सुनते उदय-व्यय और निरोध का साक्षात्कार कर विपश्यना विधि द्वारा स्रोतापन्न बन गयी उसके बाद से वह पूरे पैसों के फूल लाने लगी और सारी सच्चाई महारानी को बता दी। महारानी बहुत प्रभावित हुई। वह रोज भगवान से जो कुछ सुन कर आती उसे महारानी को सनाती। खज्जुत्तरा के जरिये भगवान के उपदेश सुनते-सुनते महारानी उनकी श्रद्धालु अनुयायिनी हो गयी। खुज्जुत्तरा भगवान की अनेक प्रमुख शिष्याओं में से एक हुई। भगवान ने उसे अग्र की उपाधि दी।

५२. शाक्य और कोलीय

शाक्य और कोलीय एक दूसरे के संबंधी ही नहीं, वरन् पड़ोसी भी थे। रोहिणी नदी के दोनों ओर उनका निवास था। एक समय ऐसा आया कि समय पर वर्षा नहीं हुई। नदी में पानी इतना कम गया कि दोनों ओर के खेतों को नहीं सींचा जा सके। दोनों ओर के मजदूर इस बात पर लड़ पड़े कि जो थोड़ा-सा पानी है उसे वे ही अपने खेतों के लिए लेंगे। बात बढ़ गयी। गाली-गलौज से मार-पीट पर आ गयी।

दोनों ओर के खेतों के मालिक-शाक्य और कोलीय नवयुवक तलवार और भाले ले-लेकर युद्ध के लिए तैयार हो गये। भगवान ने देखा तो उस खून-खराबे को रोकने के लिए वहां पहुँचे। भगवान ने उन्हें धर्मोपदेश दिया। पानी की तुलना में मानव का रक्त अधिक मूल्यवान है। दोनों ओर के योद्धाओं का सिर झुक गया। युद्ध टल गया। रक्तपात नहीं हुआ।

५३. भिक्षुणी संघ की स्थापना

महाप्रजापति गौतमी महामाया की छोटी बहन और महाराज शुद्धोदन की दूसरी पत्नी थी। सिद्धार्थ को जन्म देकर जब महामाया परलोकगामी हो गयी तब प्रजापति ने ही उसे अपना दूध पिला कर पाला-पोसा। उसे सिद्धार्थ पर अपार स्नेह था। जब सिद्धार्थ सम्यक संबुद्ध होकर कपिलवस्तु आया तब वह बहुत चाहती थी कि वह भी भिक्षुणी हो जाय।

लेकिन तब तक भिक्षुणी संघ की स्थापना नहीं हुई थी, इसलिए वह असफल रही। परंतु महाराज शुद्धोदन की मृत्यु के बाद वह गेरुए वस्त्र पहन कर, सिर मुंडा कर यशोधरा तथा अन्य ५०० शाक्य महिलाओं के साथ भगवान के पास पहुंची और भिक्षुणी संघ स्थापित करने के लिए आग्रह किया। भगवान मान गए अपने जीवन के अंतिम समय तक भिक्षुणी महाप्रजापति ने न जाने कितनी दुखियारी महिलाओं को विपश्यना सिखा-सिखा कर दुःखमुक्त किया वह इस बात को खूब समझती थी कि साधना करते हुए ही बुद्ध की सही वंदना होती है।

५४. सच्चक

सभी समय, सभी समाजों में ऐसे-ऐसे तार्किक लोग होते हैं जिन्हें अपने बौद्धिक ज्ञान का बड़ा गर्व होता है। भगवान के समय भी वैशाली में सच्चक नाम का एक बहुत बड़ा ताकि था। उसे कोई विद्वान तर्क में नहीं जीत सकता था। उसे इस बात का गर्व था कि भले भगवान बुद्ध भी उससे तर्क करें तब वह उन्हें भी हरा देगा। इस गर्व को लेकर वह भगवान से मिलने आए। अपने साथ ५०० लिच्छवी सरदारों को लेकर आया, यह दिखाने के लिए कि वह भगवान को किस प्रकार पराजित करेगा। लेकिन भगवान से बातचीत करते हुए वह तर्कहीन हो गया। निरुत्तर हो गया। उदास होकर, मुँह लटकाकर, कंधे गिराकर, प्रतिभाहीन हो गया। सच्चाई के सामने कोई क्या तर्क करता?

५५. रूपगर्विता 

खेमा सम्राट बिंबिसार स्वयं तो स्रोतापन्न अवस्था को प्राप्त हुआ ही, उसने अपने परिवार के लोगों को भी भगवान के पास भेज कर इस विद्या से लाभ उठाने की प्रेरणा दी। सभी गये, परंतु उसकी पत्नी रानी खेमा, जो बहुत रूपवती थी, वह भगवान के पास जाने को तैयार नहीं हुई। उसने सुन रखा था कि भगवान रूप को महत्त्व नहीं देते। यह उसे अच्छा नहीं लगता था। बिंबिसार ने उसे केवल मनोरम वेणुवन देखने के लिए ही जाने की प्रेरणा दी। वह वहां गयी और संयोग से भगवान के संपर्क में आ गयी।

वहां उसने देखा कि भगवान की सेवा में एक अत्यंत सुंदरी अप्सरा पंखा झल रही है। देखते-देखते वह युवती अप्सरा प्रौढ़ हुई और वृद्धा होती गयी। और देखा कि अब तो अस्थि-कंकाल मात्र रह गयी। उसकी कमर झुकती जा रही थी। झुकते-झुकते वह गिर पड़ी। मृत हो गयी। रूपगविता खेमा को होश आया कि सुंदर रूप की यही अंतिम परिणति है। उसमें धमसवग उत्पन हुआ। उसके पास पूर्व जन्मों की अनेक पुण्य पारमिताए सचित थी भगवान की करुणा भरी वाणी से उसमें विपश्यना का प्रज्ञा जागा और त निरोध अवस्था का साक्षात्कार कर धन्य हुई। खैमा प्रव्रजित होकर अरहंत हो गयी और लोकसभा में लग गयी।

५६. चमत्कार पर रोक

 राजगीर के एक श्रेष्ठी ने बहुत ऊंचे बांस पर एक बहुत मूल्यवान चंदन का गठीला काठ बांध दिया और यह घोषणा कर दी कि जो हवा में उड़ कर इसे उतार लाये, यह उसी का हो जाय। कौन ला सके? भगवान के एक शिष्य पिंडोल भारद्वाज के मन में आया कि मैं उतार लाऊं तो भगवान की प्रसिद्धि होगी। वह हवा में उड़ कर उतार लाया। लोगों ने उसकी बहुत प्रशंसा की। वह भगवान के विहार की ओर चला। पीछे-पीछे लोगों की भीड़ उसकी जयजयकार करती हुई चली।

जब वह भगवान के पास पहुँचा, उन्हें यह सारी बात मालूम हुई तब उन्होंने पिंडोल भारद्वाज को धिक्कारते हुए कहा, इस चंदन के पात्र के टुकड़े-टुकड़े कर दो, और कहा कि किसी भी प्रकार का चमत्कार दिखाना गृहस्थों को धोखा देना है। ऐसे लोग जो ऋद्धि-चमत्कार दिखाते हैं, सामान्य गृहस्थ उन्हें ईश्वर मान कर पूजते हैं। वे धर्म को नहीं, चमत्कार को पूजते हैं। इस प्रकार धीर-धीरे धर्म नष्ट हो जाता है और ये ऋद्धियां और चमत्कार ही कायम रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में कोई भी धर्माचार्य चमत्कार का प्रदर्शन न करे। इसस धर्म की हानि होती है।

५७. भिक्षुणी सिसूपचाला

महाश्रमण सारिपुत्त धर्मसेनापति कहलाते थे। उसके तीन भाई रेवत, उपतिस्स और चुंद भगवान की शिक्षा से प्रभावित होकर प्रव्रजित हो गये शीघ्र ही उन्होंने अरहंत अवस्था प्राप्त कर ली। इससे प्रभावित होकर उसकी तीनों बहनों ने भी प्रव्रज्या ग्रहण की। ये तीनों बहनें चाला, उपचाला और सिसूपचाला अरहंत हुई। मार ने दोनों बड़ी बहनों को तपभ्रष्ट करने का असफल प्रयत्न किया। तब तीसरी सिसूपचाला के पीछे पड़ा। सिसूपचाला ने उसे फटकारते हुए कहा कि दुष्ट मार, मैं संभोग के बंधनों से सर्वथा मुक्त हो चुकी हूँ। भगवान बुद्ध की कल्याणी विपश्यना शिक्षा द्वारा मैंने कामवासना विचारों को जड़ से उखाड़ दिया है। अब वे जाग ही नहीं सकते। मार पराजित और हताश होकर चला गया।

५८. चिंचा माणविका 

जैसे-जैसे भगवान की विपश्यना विद्या का प्रसार होने लगा, लोग उससे लाभान्वित होने लगे, वैसे-वैसे उनकी यश-कीर्ति बढ़ने लगी। मिथ्या कल्पनाओं, अंधमान्यताओं और कर्मकांडों पर आधारित संप्रदाय नदियों को अच्छा नहीं लगा। वे ईर्ष्या और द्वेष से जलभुन उठे। उन्होंने एक षडयंत्र रचा। एक सुंदरी युवती परिव्राजिका चिंचा माणविका को सिखा कर तैयार किया। वह त्रिया-चरित्र की दूषणता में निपुण थी। वह लोगों से कहती कि रात जेतविहार में श्रमण गौतम की गंधकुटी में बितायी।

९ महीने बाद उसने एक स्वांग रचा। अपने पेट पर लकड़ी का टुकड़ा रस्सियों से बांध कर, उस पर लाल वस्त्र लगा लिया। जब भगवान धर्मसभा में धर्मोपदेश दे रहे थे, तब वह चीख-चीख कर उन्हें अपशब्द कहने लगी अरे मथमुंडे! अपने होने वाले बच्चे के लिए तेरे पास कुछ नहीं है तो अपने इन धनी अनुयायियों को कह, वे कुछ प्रबंध करेंगे। भगवान इस मिथ्या निंदा से रंचमात्र भी विचलित नहीं हुए।

जब भगवान पर उसकी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा तब वह स्वयं घबराई। पेट पर बँधी रस्सी ढीली पड़ गयी और लकड़ी का टुकड़ा पांव पर आ गिरा। लोगों ने उसे दुत्कारा, धिक्कारा। उसने अपना वर्तमान भी बिगाड़ा और भविष्य भी। भगवान का भला क्या बिगड़ता। है तो सम्यक संबुद्ध थे, अरहंत थे।

५९ सुंदरी परिव्राजिका

 भगवान बुद्ध द्वारा विपश्यना तत्काल फल दुःखित हुए। उनको यी गयी शील, समाधि और प्रज्ञा पर आधारित नी होने के कारण फैलने लगी। इससे विरोधी युक्ति सूझी। उन्होंने सुंदरी परिव्राजिका को सिखा कर तैयार किया पहले उसे जेतवन में ऐसे-ऐसे समय भेजा जब कि भगवान के श्रद्धाल शिष्य विहार में आते-जाते उसे प्रत्यक्ष देख लें। विरोधियों को लगा कि यह भी चिंचा की भांति कोई भूल न कर बैठे, इसलिए कुछ हत्यारों को सुपारी देकर एकांत में उसकी हत्या करवा दी। फिर उसकी लाश जेतवन में ही दूर किसी गड्ढे में गिरवा दी।

हत्या करवा कर उन्होंने यह झूठी बात फैलायी कि सुंदरी परिव्राजिका जेतवन में आया जाया करती थी। वहीं भगवान के भिक्षुओं ने उसकी हत्या कर दी। राजा ने जेतवन की तलाशी ली। गाड़ी में फेंकी गयी सुंदरी की लाश निकलवायी गयी और विरोधी उसे बांस की अर्थी पर लेटा कर यह हल्ला करते हुए निकले कि देखो, पहले इन भिक्षुओं ने इसके साथ अनाचार किया और फिर उसे मार कर गढ़े में फेंक दिया। इस बात से भिक्षुआ की निंदा होने लगी। भगवान ने भिक्षुओं को समझाया कि वे घबरायें नहीं, का समता में स्थित रखें। कुछ ही समय में सच्चाई प्रकट हुई। विरोधियों का सिर नीचा हुआ। नीरज, सहनशीलता और विपश्यना मैं समता विजयी हुई।

६०. आदर्श दंपत्ति 

नकुल माता और नकुल पिता दोनों श्रेष्ठी कुलों में जन्मे थे और सुखी गृहस्थ जीवन जी रहे थे। उनका एक नकुल नाम का पुत्र था। इसलिए इसी नाम से वे जाने जाते थे नकुल पिता ने कहा कि जीवन भर में कुल माता को छोड़ कर किसी अन्य नारी को मन में भी स्थान नहीं दिया। इसी प्रकार नकुल माता ने भी कहा कि आजीवन मैंने किसी परपुरुष को मन में भी स्थान नहीं दिया। ऐसा आदर्श जीवन था उनका।

फिर भगवान के संपर्क में आने पर कल्याणी विपश्यना विद्या द्वारा दोनों ने कामवासना के विकारों का जड़ से उन्मूलन कर लिया। एक बार नकुल पिता बहुत बीमार हुआ। भगवान के दर्शन के लिए पहुँचा। भगवान ने कहा, तुम्हारा शरीर भी स्वस्थ हो, पर मन स्वस्थ रहना चाहिए। नकुल पिता ने कहा, ऐसा ही है भगवान। भगवान ने कहा- तू बड़ा भाग्यवान है। इस अवसर पर भगवान न आदर्श दांपत्य जीवन पर एक सदुपदेश दिया। भगवान ने नकली माता पिता को मत गृहस्थों में अग्र की उपाधि दी।

निष्कर्ष:

तो आज अपने Sabse Bhadiya Kahaniya | मैं पढ़ा की गौतम बुद्धा जी ने कितने हे कष्ट उठाये है अपने जीवन मैं लोगो के ताने सुनने पढ़े, परिवार से दूर होगए और ही बहुत कुछ उनके जीवन से हमे कितनी सीख मिलती है पहला यह की मुश्किलों से डरना नहीं बल्कि सामना करना चाहिए। परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी अपने पथ से डरे बिलकुल हे नहीं बल्कि उस हे पथ पर रहकर उन्होंने कितनो का कल्याण किया।

और तो और उन्होंने चमत्कार पर रोक लगाया परन्तु आज हम देखते है हर कोई झूठा चमत्कार और प्रसिद्ध होने क लिए क्या क्या लोग नहीं करते है। हमे गौतम बुद्धा जी क जीवन से सीख लेनी चाहिए और यह सब चीज़ जो सच नहीं है उस पर रोक लगनी चाहिए।

धन्यवाद 🙏

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