Gautam Buddha Life Stories Bhagwan k swaroop se parichay (Part 5)

Devotional Buddha Stories in Hindi Language (Part 5)  


Sabse Bhadiya Kahaniya | नमस्कार दोस्तों आशा है आप सब अच्छे होंगे। यह series Gautama Buddha की पूरी जीवन पर है। हर article मैं  20 कहानियाँ (stories) होंगी।  और यह कहानियाँ आपको बुद्ध (Buddha) भगवान के चरित्र और उनके कर्तव्य क बारे मैं बताएंगी। 

यह पाँचवा PART है। यह कहानियाँ मैंने छोटे मैं समझाने का प्रयास किया है ताकि आप छोटे मैं हे बोहोत कुछ समज सके। 

तो बिना कोई देर किये चैलिये शुरू करते है।


gautam-buddha-hindi-story
Buddha Stories
चित्र स्रोत: Shutterstock  

८१. भगवान की सही वंदना 


अपने जीवन के अंतिम समय तक भिक्षुणी महाप्रजापति ने न जाने कितनी दुखियारी महिलाओं को विपश्यना सिखा – सिखा कर दुःखमुक्त किया । भगवान की चरणवंदना करती हुई वह उनके इस संकेत को भली प्रकार समझ गयी कि साधना करते हुए ही बुद्ध की सही वंदना होती है ।

८२. अछूत कन्या 


प्रकृति भदंत आनंद दूर से यात्रा करता हुआ एक गांव में पहुँचा । गर्मी के दिन थे और प्यास के मारे उसका कंठ सूख रहा था । वहीं एक कुंए पर एक युवती पानी निकाल रही थी । भदंत आनंद उसके पास गया और उससे पीने के लिए पानी मांगा । वह हिचकिचायी । नीच कुल की कन्या और यह उच्च कुल का व्यक्ति उसके हाथ का पानी कैसे पीयेगा ? इसलिए उसने कहा , श्रमण ! मैं नीच जाति की हूं । आपको पीने के लिए पानी कैसे दे सकती हूं । आनंद ने धर्म से भरा हुआ उत्तर दिया । बहन , मैंने तुमसे पानी मांगा , तेरी जाति तो नहीं पूछी ।


८३. प्रकृति द्वारा विवाह 


का प्रस्ताव भिक्षु आनंद ने अपनी प्यास बुझायी और चल पड़ा । अछूत कन्या प्रकृति उसे एकटक देखती रह गयी । यकायक उसके मन में बिजली सी कौंधी कि यदि यह एक अछूत कन्या के हाथ का पानी पी सकता है तब उसे अर्धांगिनी बनाना भी अवश्य स्वीकार करेगा । वह दौड़ कर उसके पास पहुंची और अपनी इच्छा प्रकट की । आनंद ने कहा , मैं ब्रह्मचारी भिक्षु हूं ।

विवाह नहीं कर सकता । जात – पात का भेदभाव नहीं है । तुम भगवान बुद्ध के पास जाओ । उन्होंने मनुष्य मात्र को शरण दी है । वहां जात – पात का कोई भेदभाव नहीं है । तुम भगवान की शरण चली जाओ । प्रकृति धन्य हुई । भगवान की शरण गयी । उसने उनसे विपश्यना सीखी । उसका भाग्य जागा ।


८४. स्थितप्रन्न अरहंत 


की अद्भुत सहिष्णुता स्थितप्रज्ञ होगा , अरहंत होगा तो सहनशील होगा ही । उसे अजिय से अप्रिय स्थिति में भी क्रोध नहीं आयेगा । ऐसा ही स्वभाव था धर्मसेनापति सारिपुत्त का । उन्हें क्रोध नहीं आता , इसे जाँचने के लिए एक विरोधी व्यक्ति ने पीछे से उन पर मुक्के से गहरा आघात किया । परंतु ये रंचमात्र भी विचलित नहीं हुए ।

वे शांत चित्त आगे चलते गये । विरोधी ब्राह्मण ने समझ लिया कि यह सचमुच क्रोधमुक्त है । अतः पूजनीय है , वंदनीय है । यह सोचकर वह उनसे क्षमा मांगने लगा । सारिपुत्त ने उसे क्षमा किया । तब उसने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया । महास्थविर उसके घर भोजन के लिए गये ।

देखने वाले दंग रह गये कि इस व्यक्ति ने प्रहार किया । इस पर क्रोध आना तो दूर , बल्कि मैत्रीपूर्वक इसके यहां भोजन लेने भी चले गये । विपश्यना में पके हुए स्थितप्रज्ञ अरहंत की यही विशेषता होती है ।


८५. वीतक्रोध 


कोशलनरेश का पुत्र ब्रह्मदत्त भगवान का प्रवचन सुन कर श्रद्धाबहुल हो प्रव्रजित हो गया । विपश्यना का अभ्यास करते – करते चंद दिनों में ही उसे अरहंत अवस्था प्राप्त हो गयी । एक दिन भिक्षा के लिए जाते हुए उसे किसी ने बहुत बुरा – भला कहा , परंतु वह मौन रहा , शांत रहा ।

विपश्यी अरहंत को क्रोध कहां ? जो व्यक्ति क्रुद्ध व्यक्ति पर क्रोध करता है वह अपना ही अहित करता है । जो दूसरे को कुपित हुआ देख कर स्वयं शांत रहता है वह अपना भी भला करता है और दूसरों का भी ।

जिसने ब्रह्मदत्त को अपशब्द कहे वह उसके शांतचित्त से प्रभावित होकर भगवान की शरण आया । उसने भी प्रव्रज्या ली , विपश्यना साधना सीखी और विकारों से मुक्त हुआ । वह भी वीतक्रोध हुआ , दुःखमुक्त हुआ ।


८६. ब्रह्मायु धन्य हुआ! 


समझदार लोगों की यह मान्यता है कि किसी व्यक्ति को जांचना हो तो कुछ बार उससे मिलने से ही सही जांच नहीं होती । सही जांच के लिए उस व्यक्ति के साथ रात – दिन रहना होता है । ब्राह्मण ब्रह्मायु भगवान बुद्ध के बारे में पूरी सच्चाई जानना चाहता था । अतः उसने अपने शिष्य उत्तर माणवक को यह सच्चाई जांचने का काम सौंपा ।

पांच – छ महीनों तक भगवान के साथ रह कर उसने उनके ३२ शरीर लक्षण ही नहीं देखे , बल्कि उनका रहन – सहन , हलन – चलन , खान पान , उठने – बैठने आदि की हर हरकत देखी और पाया कि वे कितने अनुशासित हैं । उसका आचार्य १२० वर्ष का वृद्ध व्यक्ति था । भगवान से स्वयं नहीं मिल सकता था । परंतु उसके भाग्य से भगवान ही उसके पास आ पहुँचे । भगवान से हुई वार्तालाप से ब्रह्मायु ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हुआ , आह्लादित हुआ । वह प्रभूत पुण्यपारमी वाला व्यक्ति था ।

भगवान के उपदेश सुनते – सुनते उसमें विपश्यना जागी और उसे नित्य , ध्रुव , शांत , अमृत अवस्था का साक्षात्कार हो गया । वह स्रोतापन्न हुआ । उसने विपश्यना साधना कायम रखी तो मृत्यु के पूर्व अनागामी अवस्था को प्राप्त हो गया । उसका मंगल सधा । कल्याण हुआ ।

८७. संन्यासी दारुचीरियः 


देखने में केवल देखना सुप्पारकपत्तन नामक बंदरगाह ( आज की मुंबई ) में दारुचीरिय नामक एक अत्यंत वृद्ध संन्यासी रहता था । वह अपने आप को अरहंत समझता था । परंतु एक दिन किसी हितैषी ने उसे बताया कि अरहंत होने की शिक्षा भगवान सम्यक संबुद्ध श्रावस्ती में देते हैं । यह सुन कर संन्यासी तत्काल श्रावस्ती की ओर चल पड़ा ।

लंबी यात्रा पूरी करके जब जेतवन विहार पहुंचा तब जाना कि भगवान भिक्षाटन के लिए नगर की ओर गये हैं । वह नगर की ओर चला और सामने भगवान को देख कर उनके चरणों पर सिर रख कर बोला कि मुझे अरहंत होने की शिक्षा दीजिये ।

भगवान ने निकट भविष्य में ही उसकी मृत्यु को देख कर थोड़े में विपश्यना की अंतिम मंजिल की शिक्षा दी दिट्टे दिट्ठमत्तं भविस्सति यानी देखने में प्रज्ञापूर्वक मात्र देखना हो । इसी प्रकार सुनना , चखना , छूना और जानना मात्र ही हो । समझदार संन्यासी को विपश्यना का यह गंभीर उपदेश समझ में आ गया । वह पूर्व पारमी संपन्न था । विपश्यना करते – करते वह अरहंत हो गया । वहीं उसकी मृत्यु हो गयी । भगवान ने भिक्षुओं से कहा कि दाहक्रिया करके उसकी अस्थियों को एक स्तूप में सन्निधानित करें ।


८८. रोगी की सेवा 


एक भिक्षु को सारे शरीर में फोड़े – फुसियों की बड़ी तीव्र बीमारी हो गयी । लगातार रिसते घावों के कारण वह अबल असहाय पीप – दून से लथपथ पड़ा रहता था । एक बार उस ओर जाते हुए भगवान ने देखा कि उसकी इतनी दुर्दशा है और कोई भिक्षु उसकी सेवा – सुश्रुषा नहीं कर रहा है । भगवान ने आयुष्मान आनंद से पानी मँगवाया और दोनों ने मिल कर उसे नहलाया और मलहम लगाया ।

तत्पश्चात भगवान ने भिक्षुसंघ को एकत्र करके कहा कि ” यहां तुम्हारे माता – पिता नहीं हैं । तुम एक – दूसरे की सेवा नहीं करोगे तो कौन करेगा ? यदि कोई रोगी हो गया तो तुम्हें उसकी सेवा तबतक करनी चाहिए , जबतक कि वह निरोग न हो जाय । यदि कोई सेवा न करे तो दह दोष का भागी होगा । ” भगवान ने यह भी कहा , ” भिक्षुओ , जो मेरी सेवा करना चाहे , वह रोगी की सेवा करे । “


८ ९. मुक्त हुआ बंदी 


कोशलनरेश प्रसेनजित ने एक निरपराध अमात्य को कारावास में डाल दिया । कैदी समझदार था । उसने सोचा कि यह मेरे पूर्व जन्म के कर्म का फल है । मैं अपने मन को मैला क्यों करूं ? क्यों न समय का सदुपयोग करूं ? वह विपश्यना का अभ्यास करने लगा , जिसे कि उसने पहले किसी भिक्षु से सीखी थी । अभ्यास करते – करते उसकी विपश्यना प्रबल हुई और वह स्रोतापन्न हो गया । उसका नया जीवन आरंभ हुआ । राजा को अपनी भूल का पता चला तब उसे जेल से मुक्त कर दिया गया ।


gautam-buddha-hindi-story
Gautam Buddha Life Stories

चित्र स्रोत: Shutterstock 

९०. धम्मदिन्ना धम्मदिना



राजगीर के धनकुबेर श्रेष्ठी विशाख की धर्मपत्नी थी । सदा की भांति एक दिन विशाख भगवान के पास धर्म सीखने  गया और लौटने पर न अपनी पत्नी के प्रति प्रेम प्रदर्शित किया और न भोजन में रुचि दिखायी । पत्नी को यह अच्छा नहीं लगा । तब उसने पत्नी को समझाया कि मैं भगवान के संपर्क में आकर विपश्यना साधना करते हुए आज अनागामी अवस्था प्राप्त कर चुका हूं ।

यह सुन कर पत्नी में भी धर्मसंवेग जागा । पति की अनुमति लेकर वह प्रव्रजित हुई । उसने विपश्यना द्वारा अरहंत अवस्था प्राप्त कर ली । एक दिन अनागामी विशाख उसके पास आया और आदरपूर्वक धर्म के कुछ प्रश्न पूछने लगा । जब उसने निर्वाण संबंधी कुछ एक गंभीर प्रश्न किये , तब भिक्षुणी धम्मदिन्ना ने कहा कि अरहंत अवस्था प्राप्त कर लोगे तभी इसे समझ सकोगे ।

धम्मदिन्ना की वाणी से प्रभावित होकर उसने भी विपश्यना करते – करते अरहंत अवस्था प्राप्त कर ली । धम्मदिना भगवान की प्रमुख शिष्याओं में से एक हुई । भगवान ने उसे अग्र की उपाधि दी ।


९ १. मिगारमाता 


विशाखा साकेत में बसे श्रेष्ठी धनंजय ने अपनी पुत्री विशाखा का विवाह श्रावस्ती के श्रेष्ठी मिगार के पुत्र पुण्यवर्धन से कर दिया । विशाखा ७ वर्ष की उम्र में ही भगवान के संपर्क में आयी थी । अब भगवान द्वारा श्रावस्ती में ही वर्षावास करने के कारण वह अपनी धर्मसंज्ञा बढ़ाती रही । उसने श्रद्धापूर्वक नगर के पूर्व की ओर विशाल पूर्वाराम बना कर दान दिया । भगवान ने उसे दानी उपासिकाओं में अग्र की उपाधि दी ।

उसका श्वासुर अपनी बहू से नाखुश रहता था । एक बार क्रुद्ध होकर उसने विशाखा को घर से निकालने का फैसला किया । बात पंचों तक पहुंची । जो – जो लांछन श्वासुर मिगार ने उस पर लगाये , विशाखा ने उनका उचित उत्तर देकर स्पष्ट कर दिया । इससे मिगार बहुत प्रसन्न हुआ । तत्पश्चात भगवान घर पर आमंत्रित किये गये ।

उसने उनका प्रवचन सुना । सुनते – सुनते उसकी पूर्व पारमी के कारण शरीर में अनित्यबोध का प्रवाह जाग उठा । वह धन्य हुआ । उसने पहले विशाखा को नमन किया और कहा कि तू मेरी मां है । तूने ही आज मुझे नया जन्म दिया है । तबसे विशाखा मिगारमाता कहलाने लगी ।

९२. सुजाता सुधरी 


विशाखा की छोटी बहन सुजाता का विवाह सेठ अनाथपिंडिक के पुत्र से हुआ । सुजाता के मन में धनकुबेर की पुत्री होने का बड़ा गर्व रहता था । इस कारण वह घर में सब से कलह करती रहती थी । किसी से सीधे मुँह बात नहीं करती थी । परिवार में सदा कलह कोलाहल बना रहता था । एक बार भगवान उसके घर आये और उसे बड़े प्यार से आदर्श गृहिणी होने का उपदेश दिया , जिससे वह प्रभावित हुई और धर्म की ओर आकृष्ट हुई । उसका स्वभाव बदल गया । घर में सुख – शांति बनी रहने लगी ।


९३. आनंदबोधि 


भगवान जेतवन में केवल वर्षावास में ही चार महीने रहते थे । बाकी समय भिन्न – भिन्न स्थानों में धर्मचारिका करते थे । उस समय जेतवन विहार में सूनापन छा जाता था । इसे देख कर श्रेष्ठी अनाथपिडिक को बड़ा कष्ट होता था । पर क्या करता ? वह चाहता था कि जब भगवान चारिका पर निकलें तब जेतवन में उनका कोई या मूर्ति स्थापित कर दी जाय ताकि उनकी अनुपस्थिति में भक्त लोग उसकी पूजा अर्चना करने आते रहें । उसने आनंद के जरिये अपनी मंशा भगवान तक पहुंचायी ।

परंतु भगवान ने इसे स्वीकार नहीं किया । ठीक ही तो है , मूर्ति या के मंदिरों की स्थापना होगी तब लोग केवल नमस्कार करने और प्रार्थनाएं करने के लिए ही आयेंगे । वे विकारों से मुक्त होने की विपश्यना विद्या भूल जायेंगे । उन्होंने कहा , अगर तुम्हें यहां कोई प्रतीक ही खड़ा करना है तो बोधगया से बोधिवृक्ष के बीज लाकर यहां बो दो ।

इससे जो वृक्ष खड़ा होगा उसके नीचे बैठ कर लोग विपश्यना का अभ्यास करेंगे और धर्म में पकेंगे । बोधिवृक्ष का जो बीज आनंद वहां ले आया और उससे जो वृक्ष खड़ा हुआ वह आनंदबोधि ‘ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । आज २६०० वर्ष के बाद भी वह पावन वृक्ष जीवित है ।

९४. वृषल कौन? 


भगवान श्रावस्ती में घर – घर भिक्षाटन करते हुए अग्गिक भारद्वाज के घर के समीप पहुंचे तब उन्हें देख कर वह चीख उठा- रुक रे मुंडक , वहीं रुक । उसे डर था कि उसके पवित्र अग्नि – हवन में किसी श्रमण की अपवित्र छाया न पड़े । उसने भगवान को ‘ वृषल ‘ कह कर दुत्कारा । वृषल उसे कहते हैं जो शूद्रों से भी शूद्र हो । इस पर भगवान ने उससे पूछ लिया कि क्या तुम जानते हो कि वृषल कौन होता है ? नहीं , कहने पर भगवान ने वृषल की व्याख्या की ।

कोई व्यक्ति जन्म से न वृषल होता है और न ही ब्राह्मण । कर्म से ही वृषल होता है , कर्म से ब्राह्मण होता है । चांडाल – पुत्र सोपाक मातंग होते हुए भी विपश्यना धर्म में आगे बढ़ गया और मृत्यु होने पर जब ब्रह्मलोक गया तब उसकी जाति उसे नहीं रोक सकी । इसी प्रकार एक वेदपाठी ब्राह्मण पापकर्म करता है तब अधोगति से उसकी जाति उसे नहीं बचा सकती । भगवान की यह वाणी सुन कर अग्गिक भगवान का शरणागत उपासक हो गया । उसका भाग्य जागा ।

९५. सत्पुरुष बिंबिसार 


देवदत्त ने सिद्धयों का प्रदर्शन कर राजकुमार अजातशत्रु को अपने वश में कर लिया । उसका मुख्य उद्देश्य था भगवान की हत्या करवा कर स्वयं विशाल भिक्षुसंघ का गणाचार्य बनना । उसने अजातशत्रु को पिता की हत्या करने के लिए उकसाया ।

अजातशत्रु ने हत्या का प्रयत्न किया , पर असफल रहा । तदनंतर बिंबिसार ने वात्सल्यभाव से प्रेरित होकर अजातशत्रु को राजगद्दी देकर स्वयं अवकाश ग्रहण कर लिया ।

देवदत्त की कुमंत्रणा के कारण उसने पिता बिंबिसार को कारावास में डाल दिया और उसे निराहार रख कर खत्म कर देने की योजना बनायी । पति को भूखों मरने से बचाने के लिए अजातशत्रु की माता ने बहुत प्रयत्न किये पर असफल रही । बिंबिसार विपश्यी साधक था । विपश्यना करता हुआ चंक्रमण करने लगा ।

यों भूख की यंत्रणा का सामना करने लगा । अजातशत्रु को यह भी नहीं सुहाया । उसने राज्य के नाई द्वारा उसकी पगथली चीर कर उसमें नमक भरवाया , जिससे वह चल भी न सके । इस पीड़ा में भी उसके मन में अपने पुत्र के प्रति रंचमात्र भी द्वेष नहीं जागा । मैत्री ही जागी । बिंबिसार सचमुच दृढ़ विपश्यी सत्पुरुष या । इसी कारण मरणांतक असह्य पीड़ा में भी उसका चित्त अविचल रहा ।

९६. बुद्ध की हत्या 


का षड्यंत्र देवदत्त ने अजातशत्रु से मिल कर बुद्ध की हत्या के लिए एक षड्यंत्र रचा । कुछ पेशेवर हत्यारों द्वारा बुद्ध की हत्या करवाने की योजना बनायी । लेकिन भगवान उससे बच निकले । हत्यारे भी बचा लिये गये । देवदत्त की योजना असफल हुई ।

९७. नालागिरि 


देवदत्त ने भगवान बुद्ध की हत्या करने के लिए अनेक प्रयत्न किये । पर सफल नहीं हुआ । हस्तिशाला में नालागिरि नाम का एक प्रमत्त और बलशाली हाथी था । जब बुद्ध शहर में मिक्षाटन के लिए निकले तब देवदत्त ने उस सड़क पर क्रुद्ध नालागिरि को छोड़वाया ।

नालागिरि सूंड उठाये , दोनों कान फड़फड़ाते , चिंघाड़ते हुए भगवान की ओर दौड़ चला । भिक्षुओं ने भगवान से सड़क छोड़ कर हट जाने का निवेदन किया । परंतु भगवान निडर , निष्कंप , शांतचित्त से सड़क पर आगे बढ़ते ही चले गये ।

उनके मन में क्रोध से व्याकुल हाथी के प्रति करुणा का फौव्वारा फूटा । उस मैत्री की शीतल धारा की बौछार उस पर गिरने लगी । वह शांत हो गया । भगवान के सामने जाकर उसने अपनी सूंड नीची कर ली और घुटने टेक दिये । भगवान ने वात्सल्यभाव से अपनी हथेली से उसका कुंभ थपथपाया । वह पुलकित हो उठा । उसने भगवान के चरणों की धूल अपनी सूंड से उठायी और उसे अपने सिर पर बिखेरते हुए वहां से उठ खड़ा हुआ और चला गया । नालागिरि धन्य हुआ ।



९८ .मैं स्वयं हत्या करूंगा 


भगवान बुद्ध की हत्या करवाने में असफल हो जाने पर देवदत ने निश्चय किया कि वह स्वयं हत्या करेगा । भगवान जाब गृहकूट पर्वत पर जाते तब सीढ़ियां चढ़ते हुए मध्य मार्ग में कुछ देर विश्राम करते थे । देवदत्त ने ऐसे समय उन पर ऊपर से एक बड़ा शिलाखंड गिराया । शिलाखंड ऊपर ही किसी दूसरे शिलाखंड से टकराकर वहीं रुक गया , परंतु उसकी एक पपड़ी टूट कर भगवान के पैरों पर आ गिरी और घाव कर दिया । वे इससे भी बच गये । उस बोट को भगवान ने समतापूर्वक सहन किया ।



९९. भयभीत अजातशत्रु 


पिता की हत्या के कारण अजातशत्रु सदा व्याकुल रहता था । एक बार वह जीवक के साथ उसके आम्रवन में विहार कर रहे भगवान से मिलने गया । वहां १२५० भिक्षुओं के साथ भगवान ध्यान कर रहे थे । आम्रवन पहुंचने के पहले उसे घबराहट होने लगी कि कहीं उसे जाल में तो नहीं फंसाया जा रहा ।

इतनी बड़ी संख्या में लोग बैठे हों और उनके खांसने – खंखारने की आवाज तक नहीं । जीवक ने उसे विश्वास दिलाया और जब वह भगवान के समीप पहुँचा तब इतने लोगों को देख चकित रह गया । भगवान ने उसे उपदेश दिया जिससे उसे बहुत शांति मिली ।

वह भगवान का भक्त बन गया । से कोई न बचा । मल्लिका भगवान की प्रमुख शिष्या थी । विपश्यना की प्रज्ञा में पकी हुई थी । इतने बड़े आघात से भी उसका चित्त विचलित नहीं हुआ ।

 १००. सहिष्णुता और समता 


बंधुल मल्ल और राजकुमार प्रसेनजित तक्षशिला में शिक्षा पाते समय सहपाठी थे , मित्र थे । अतः राजकुमार प्रसेनजित जब कोशलनरेश हो गया तब उसने बंधुल को सेनाध्यक्ष बनाया । उसने अपनी जिम्मेदारी बहुत अच्छी तरह निभायी ।

लेकिन कुछ लोगों को उससे ईर्ष्या हुई । उन्होंने राजा के मन को यह कह कर दूषित कर दिया कि सेनापति बंधुल अपने बलवान पुत्रों और सेना की मदद से तुम्हारी राजगद्दी हथियाना चाहता है । इस झूटी सूचना से प्रसेनजित घबरा उठा और कोई षडयंत्र करके बंधुल को उसके सभी पुत्रों सहित मरवा दिया ।

उसी दिन बंधुल की पत्नी मल्लिका ने भिक्षुओं को भोजन पर आमंत्रित कर रखा था । भिक्षु पधारे । उसने भोजन परोसना शुरू किया था कि अचानक दासी के हाथ से भोजन का एक पात्र गिरा और टूट गया ।

प्रधान भिक्षु ने कहा कि इस बर्तन के टूटने से चिंतित नहीं होना ! मल्लिका ने उत्तर दिया , भंते में क्या चिंतित होती । अभी – अभी सूचना मिली है कि राजा ने षड्यंत्र करके मेरे पति और सभी पुत्रों की हत्या करवा दी है । अब उनमें धन्य सहनशीलता , धन्य समता । धन्य विपश्यना ।


.

निष्कर्ष:


तो आज अपने Sabse Bhadiya Kahaniya | मैं पढ़ा की भगवन गौतम बुद्धा की लीलाये कैसे लोग उनकी पूजा और वंदना करने लगे परंतु मुश्किलें अभी खतम नहीं हुई है। आगे की कहानियों मैं आपको पता चलेगा। 

तो आपको यह 20 कहानियाँ किसी लगी कृपया मुझे comment section मैं बताए अब आप लोगो के लिए अगली बाकी की कहानियों की तैयारी करनी है और खोज करनी है। मैं अपने काम मैं सफल रहूंगी मुझे विश्वास है भगवन बुद्धा पर वे मार्गदरशन कर रहे है और मैं जरूर आप लोगो क लिए उनकी आगे क जीवन क बारे मैं  कहानियों के माध्यम से आप सबको उनकी पूरी लीलाये बता पाऊँगी।


धन्यवाद 🙏

जानिए और गौतम बुद्धा के बारे मैं wikipedia पर यहाँ क्लिक करे…. Gautam Buddha Wikipedia in Hindi  

2 thoughts on “Gautam Buddha Life Stories Bhagwan k swaroop se parichay (Part 5)”

Leave a Comment