Gautam Buddha Life | Motivation (Part 1)

  Best Gautama Buddha Hindi Devotional Stories (Part 1) 

Sabse Bhadiya Kahaniya | नमस्कार दोस्तों आशा है आप सब अच्छे होंगे। आज मैं आपके लिए एक बहुत अच्छी series लेकर आया हूँ।  
यह series Gautama Buddha की पूरी जीवन पर होगी (Gautam Buddha History) और हर article मैं  20 कहानियाँ (stories) होंगी। और यह कहानियाँ आपको बुद्ध (Buddha) भगवान के चरित्र और उनके कर्तव्य क बारे मैं बताएंगी। 
यह पहला PART है। यह कहानियाँ मैंने छोटे मैं समझाने का प्रयास किया है ताकि आप छोटे मैं हे बोहोत कुछ समज सके। 
तो बिना कोई देर किये चैलिये शुरू करते है। Gautam Buddha Thoughts

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Bhagwan Buddha

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1. तापस सुमेध (Tapas Sumedh)

अनेक कल्प पूर्व भगवान दीपंकर सम्यक संबुद्ध थे। उन्होंने कीचड़ में औधे मुँह लेटे परम श्रद्धालु ब्राह्मण तपस्वी सुमेध की मनोकामना जानी। 

और उसका भविष्य (future) देख कर यह भविष्यवाणी की कि अनेक कल्पों तक आवश्यक पारमिताएं पूरी करने के बाद वह सिद्धार्थ गौतम के नाम से “निस्संदेह बुद्ध बनेगा”

भगवान की यह मंगलमयी घोषणा धरती और आकाश में गूंज उठी और देर तक इसकी प्रतिध्वनि होती रही।

इसी समय सुमित्रा नाम की ब्राह्मण पुत्र को भी मनोकामना जान कर भविष्यवाणी की कि वह इस युवक के साथ-साथ हर जन्म मे इसकी जीवनसंगिनी (life partner) बनेगी और अंत में जब यह सिद्धार्थ गौतम के नाम से शाक्य कुल में जन्मेगा। 

तब सम्यक संबुद्ध बनेगा और तब यह यशोधरा के नाम से इसकी सहधर्मिणी बनेगी और इससे विपश्यना विद्या प्राप्त करके जन्म-मरण से मुक्त हो जायगी।

2. गर्भाधान स्वप्न (Garbh  Dream)

कल्प-पर-कल्प बीतते गये और बोधिसत्व ने परिश्रम करके समस्त पारमिताओं को परिपूर्ण कर लिया। अब उसे अंतिम जन्म लेना है।

इसके लिए उसने पुण्यमयी माता महामाया का चुनाव किया।

महामाया अपने शयनकक्ष में गहन निद्रा में सोयी थी। उसने एक स्वप्न देखा। एक अत्यंत सुंदर, श्वेत रंग का हाथी अपनी सूंड में श्वेत कमल का फूल लिए हुए प्रकट हुआ। 

उसने माता महामाया का नमन किया और फिर उसकी कोख में समा गया। यही बोधिसत्व का अंतिम गर्भप्रवेश था।

3. जन्म (Janam)

प्रसव का समय समीप आने पर माता महामाया ने इच्छा प्रकट की कि उसकी संतान का जन्म उसके पीहर देवदह हो। 

वह कपिलवस्तु से देवदह की यात्रा पर निकली। 
मार्ग में अत्यंत सुंदर लुंबिनी वन को देख कर वहां कुछ देर रुकने को मन चाहा। 
वह रथ से उतरी और घूमते हुए जैसे ही साल वृक्ष की एक टहनी को पकड़ा कि पुत्र का जन्म हो गया। 
यह बोधिसत्व सभी पारमिताओं से परिपूर्ण होने के कारण लोक में अग्र था, लोक में ज्येष्ठ था, लोक में श्रेष्ठ था। यह उसका अंतिम जन्म था। अब उसके और जन्म नहीं होंगे।

४. ऋषि कालदेवल (Rishi Kaldewal)

माता अपने नवजात पुत्र को लिए हुए कपिलवस्तु के राजमहल में लौटी। चारों ओर प्रसन्नता छायी हुई थी। 

शाक्यों और कोलियों के राजगुरु ऋषि कामदेव ने जब सुना कि शाक्य जी के घर पुत्र का जन्म हुआ है तब वह उसे देखने आया। 
पिता ने पुत्र को ऋषि कालदेवल के सम्मुख उपस्थित किया यकायक बालक का पांव ऋषि की जटाओं में लग गया। 
ऋषि प्रसन्नता से विभोर हुआ। परंतु फिर रोने भी लगा। 
प्रसन्नता इस बात की कि यह बालक आगे जाकर सम्यक संबुद्ध बनेगा और बहुत लोक-कल्याण करेगा। 
दुख इस बात का कि तब तक मैं जीवित नहीं रह सकूंगा। 
परंतु उसने अपने भांजे नालक को सूचना दी कि जब कभी यह बालक सम्यक संबुद्ध बने तब उसर धर्म सीख कर मुक्त अवस्था प्राप्त कर लेना।

5. बालक सिद्धार्थ का प्रथम ध्यान (Balak Siddharth ka pehla Dhyan)

जब बालक सात वर्ष का हुआ तब देश के नियमों के अनुसार प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी प्रथम वर्षा होने पर हल जोतने का काम महाराज शुद्धोदन ने किया। 

इस अवसर पर बड़ा मेला लगा। लोग मेले का आनंद लेने लगे। 
परंतु सिद्धार्थ को इसमें जरा भी रुचि नहीं थी। वह वहां जामुन के बड़े पेड़ के तले बैठा ध्यानस्थ हो गया। 
पिता ने जब यह देखा तब उसके मन में श्रद्धा जागी और उसने अपने पुत्र को नमन किया।

6. हिंसक देवदत्त (Hinsak Devadatt)

देवदत्त राजकुमार सिद्धार्थ का ममेरा भाई था। दोनों के स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर था। 

देवदत्त जहां अपने वाणों से पक्षियों को बींध-बींध कर आनंद लेता था, वहीं सिद्धार्थ उनके प्रति करुणा बरसाता था। 
एक बार देवदत्त ने एक उड़ते हुए हंस पर तीर चलाया जो कि तड़पड़ा कर धरती पर आ गिरा। 
सिद्धार्थ ने उसे अपनी गोद में उठा लिया और उसकी परिचर्या करने लगा। 
देवदत्त चाहता था कि यह उसका शिकार है इसलिए उसे मिले। लेकिन सिद्धार्थ ने कहा, “जो बचाता है वह मालिक होता है, न कि जो मारता है।

7. अतुलनीय तीरंदाज (Atulaneey Teerandaaj

राजकुमार सिद्धार्थ ने भी तीर चलाने की विद्या में परिपूर्णता प्राप्त की। 

लेकिन इस विद्या को सीखते हुए किसी पक्षी की हत्या करना तो दूर, उसने किसी वृक्ष पर भी तीर चला कर उसे आहत नहीं किया। 
वृक्ष पर एक सूखी लकड़ी का फलक रखा गया। उसी पर उसने तीर चला-चला कर इस विद्या में निपुणता प्राप्त की।

8. पराक्रमी योद्धा और अद्भुत घुड़सवार (Paraakramee Yoddha aur Adbhut Ghudasavaar)

लोगों को संदेह था कि सिद्धार्थ युद्ध कला में कुशल नहीं है अतः वह देश का राजपाट कैसे संभालेगा? 

इसके बारे में उसकी परीक्षा हुई जिसमें वह पूर्णतया सफल हुआ। लोग प्रसन्न हुए।

एक पराक्रमी योद्धा के लिए कौशल घुड़सवारी भी आवश्यक है। 

इस क्षेत्र में भी उसकी परीक्षा हुई। 
एक जंगली क्रोधी घोड़े को उसने बड़े प्यार से थपथपाते हुए शांत कर अपने वश में कर लिया। 
इस देख कर भी लोग प्रभावित हुए, प्रसन्न हुए।

9. कोलियराज सुप्पबुद्ध की पुत्री का विवाह-मंगल (Koliyaraaj Suppabuddh kee Putri ka Vivaah-Mangal)

देवदह का कोलिय राजा सुप्पबुद्ध अपनी पत्नी यशोधरा के विवाह के लिए आतुर था। 

उसे राजकुमार सिद्धार्थ पसंद तो था परंतु उसकी योग्यता पर संदेह था। 
वह जांचना चाहता था। जांच में पूर्णतया कुशल पा कर उसने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार सिद्धार्थ से कर दिया।

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10. चार निमित्तों में से पहला निमित्त (Chaar Nimitton mein se Pahala Nimitt)

राजकुमार सिद्धार्थ बड़ा हुआ। परंतु उसे राजसी आमोद-प्रमोद में कोई रुचि नहीं थी। 

एक बार जब वह कपिलवस्तु नगर के निरीक्षण हेतु निकला तब धर्मसंवेग जगाने वाले कुछ निमित्त देखे

उसने देखा कि एक व्यक्ति बहुत बीमार पड़ा है। पूछने पर सारथी ने बताया कि बीमारी की ऐसी अवस्था सब को आती है।

11. दूसरा निमित्त (Doosara Nimitt)

आगे चला तब देखा कि एक बूढ़ा आदमी लाठी के सहारे चल रहा है जिसकी कमर झुकी हुई है। 

सारथी ने बताया कि बुढ़ापे की ऐसी अवस्था सब को आती है।

12. तीसरा निमित्त (Teesara Nimitt)

और आगे चला तब देखा कि कुछ लोग एक मुर्दे को जलाने के लिए मरघट पर ले जा रहे हैं। 

सारथी ने बताया कि ऐसा भी सब को होता है। सब को एक-न-एक दिन मरना ही पड़ता है।

13. चौथा निमित्त (Chautha Nimitt)

और आगे चल कर उसने देखा कि एक श्रमण वृक्ष के नीचे बैठा ध्यानस्थ है। 

उससे कुछ देर बात करने पर राजकुमार के मन में वैराग्य जागा।
मैं भी इसी प्रकार ध्यान में प्रवीण होकर सम्यक संबोधि प्राप्त करूंगा। इस निर्णय के साथ वह राजमहल लौट आया।

14. गृह-त्याग (Ghar ka Tyaag)

राजकुमार सिद्धार्थ जब नगर-निरीक्षण करके लौटा तब उसने सुना कि पत्नी यशोधरा ने पुत्र को जन्म दिया है। 

यह सुनकर उसने तत्काल निर्णय किया कि मुझे अभी गृह-त्याग कर तपस्या में लगना है। 
परंतु घर छोड़ने के पहले वह अपने नवजात पुत्र का मुंह देखना चाहता था। 
इसलिए शयनकक्ष की ओर गया और वहां देखा कि यशोधरा अपने पुत्र के सिर पर हाथ रखे हुए गहरी नींद में सोयी हुई है। 
उसे जगाना उचित नहीं समझा। इस कारण वह अपने पुत्र का मुँह पूरी तरह न देख सका। 
अतः निर्णय किया कि मैं जब सम्यक संबुद्ध बन कर कपिलवस्तु लौटूंगा तभी अपने पुत्र का मुँह देखूंगा। 
यह सोच कर वह गृह त्यागने के लिए उद्यत हुआ।

15. श्रमणवेश धारण किया (Shramanavesh Dhaaran Kiya)

अपने प्रिय घोड़े कंथक पर सवार होकर, अपने सेवक और मित्र छंदक के साथ वह राजमहल के ही नहीं, कपिलवस्तु नगर के भी बाहर निकल गया। 

आगे बढ़ता हुआ अनोमा नदी को पार करके ही वह रुका। 
वहां उसने अपनी राजसी वेशभूषा को त्याग कर गृहत्यागियों के गेरुए वस्त्र पहने और अपने सिर के बालों को स्वयं काटा। 
छंदक और कंथक को विदा करके वह तपस्या के लिए आगे यात्रा पर निकल पड़ा।

16. मगध की यात्रा (Magadh ki Yaatra)

उसका लक्ष्य मगध देश जाना था। वहां श्रमण परंपरा के ध्यानाचार्य रहते थे। 

मार्ग में वह मगध की राजधानी राजगीर में से गुजरा। 
लोग इस अद्भुत वैरागी को देख कर चकित रह गए घर-घर से भिक्षा प्राप्त करके वह पांडु गुफा के समीप विश्राम करता हआ भोजन करने बैठा। 
जैसे ही उसने भोजन समाप्त किया, देश का राजा उससे मिलने आया। 
राजा बिंबिसार ने जब यह जाना कि यह उसके मित्र शाक्य जी का पुत्र है तब उसे संन्यासी का जीवन छोड़ने के लिए अपने राज्य के कुछ भाग का अधिपति बनाने का प्रस्ताव रखा। 
परंतु सिद्धार्थ अपने निर्णय पर अडिग था। उसने यह प्रस्ताव अस्वीकार किया और यात्रा पर आगे बढ़ चला।

17. आचार्य आलार कालाम (Aachaary Aalaar Kaalaam)

उन दिनों श्रमण परंपरा के दो प्रसिद्ध ध्यान आचार्य थे जिनमें से एक था। 

आचार्य आलार कालाम। 
गृहत्यागी सिद्धार्थ उसके आश्रम में पहुँचा और उससे ध्यान सीखने की इच्छा प्रकट की। 
आलार कालाम ने प्रसन्न होकर उसे सातवां लोकीय ध्यान सिखाया। उसकी क्षमता इतनी ही थी।
 सिद्धार्थ को संतोष नहीं हुआ क्योंकि उसे मुक्त अवस्था की खोज थी। अतः वह उसे धन्यवाद देकर आगे बढ़ चला।

18. उद्दक रामपुत्त (Uddak Raamaputt)

उन दिनों का दूसरा अत्यंत प्रसिद्ध श्रमण ध्यानाचार्य था उद्दक रामपुत्त। 

गृहत्यागी सिद्धार्थ उसके आश्रम में पहुँचा। वहां उसने आठवां लोकीय ध्यान संपन्न किया। 
परंतु इससे भी उसे संतोष नहीं हुआ। 
उसे इससे भी आगे लोकतंत्र अवस्था की अनुभूति प्राप्त करनी थी, जिससे कि जन्म-मरण के भवसंसरण से मुक्ति प्राप्त हो। 
वह आचार्य उद्दक रामपुत्त को भी धन्यवाद देते हुए आगे बढ़ चला।

19. दुष्करचर्या (Dushkaracharya)

उन दिनों उरुवेला का स्नान ध्यान के लिए बहुत प्रसिद्ध था। 

श्रमण सिद्धार्थ वहीं पहुँचा और ध्यान में बैठ गया। कपिलवस्तु के पांच ब्राह्मण ज्योतिषी भी उसे खोजते हुए वहां आ पहुँचे .
और वे भी उसके साथ तपस्या में लग गये। 
उन दिनों की एक प्रसिद्ध मान्यता थी कि शरीर को जितना-जितना कष्ट दिया जाय उतने-उतने कर्म संस्कार की निर्जरा होती जाती है और अंततः नितांत मुक्त अवस्था सहज ही प्राप्त हो जाती है। 
सिद्धार्थ ने इसका कठोर प्रयोग किया। अन्न त्यागते-त्यागते, उसने अपने शरीर को सुखा-सुखा कर कांटे जैसा बना लिया। वह अत्यंत दुर्बल हो गया। 
तिस पर भी उसे लोकातीत अवस्था प्राप्त नहीं हुई। अतः उसने आहार ग्रहण करने का निश्चय किया।

20. दुष्करचर्या का त्याग (Dushkaracharya ka Tyaag)

जैसे ही उसने आहार ग्रहण किया, उसके पांचों ब्राह्मण साथियों ने समझा कि यह अब तपभ्रष्ट हो गया है। 

अतः इसे सफलता प्राप्त नहीं होगी। 
यह सोच कर वे उसे त्याग कर चले गये।

(Conclusion):

Gautam Buddha Story | गौतम बुद्धा को दुसरो को धर्म यानी कर्तव्य पर चलने क लिए उने पहले अपने जीवन मैं धर्म का आचरण करना बहुत जरुरी है।  यहाँ से भगवान ने पहले चरण शुरू कर दिए है।

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