Gautam Buddha Life Devotional Hindi Stories (Part 2)

 Gautama Buddha Stories Bhagwan ki durdrishti (Part 2) 

Sabse Bhadiya Kahaniya | नमस्कार दोस्तों आशा है आप सब अच्छे होंगे। यह series का नाम है Gautama Buddha stories इसमें गौतम बुद्धा जी  की पूरी जीवन के बारे मई बताया जायेगा । 

हर article मैं  20 कहानियाँ (stories) होंगी।  और यह कहानियाँ आपको बुद्ध (Buddha) भगवान के चरित्र और उनके कर्तव्य क बारे मैं बताएंगी। Gautam Buddha Information
यह दूसरा PART है। यह कहानियाँ मैंने छोटे मैं समझाने का प्रयास किया है ताकि आप छोटे मैं हे बोहोत कुछ समज सके। 
तो बिना कोई देर किये चैलिये शुरू करते है।

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Gautam Buddha Life Story Part 1 
Gautam Buddha Life Story Part 3
Gautam Buddha Life Story Part 4  
Gautam Buddha Life Story Part 5   
Gautam Buddha Life Story Part 

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Gautama Buddha stories

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पांच स्वप्न वैशाख शुक्ल चतुर्दशी की रात सोये हुए उसे पांच स्वप्न दिखे।

21. पहला स्वप्न (Pehla Sapna)

उसने देखा कि उसकी काया विराट होती जा रही है। विराट होकर उसका सिर हिमालय की सर्वोच्च शिखर पर जा टिका है और उसका दाहिना हाथ अरब सागर की लहरियों द्वारा प्रक्षालित हो रहा है।

उसका बायां हाथ बंग सागर की लहरियों द्वारा प्रक्षालित हो रहा है। उसके चरण हिंद महासागर की लहरियों द्वारा प्रक्षालित हो रहे है। 
इस स्वप्न द्वारा भारत और नेपाल के इतिहास में पहली बार इन दाना का, यानी जंबू द्वीप का एक नक्शा प्रकट हुआ।
इसका उद्देश्य या कि वह सम्यक संबद्ध बन कर सारे जंबू द्वीप पर छा जायगा और उनकी शिक्षा यहीं तक नहीं बल्कि सिर के शिरे से उत्तरी देशो में और दाहिनी-बायीं भुजाओं और पावों से समुद्री लहरियों के पार दूर दूर देशों तक सारे विश्व में फैलेगी।

22. दूसरा स्वप्न (Dusra Sapna)

उसने दूसरा स्वप्न देखा कि उसकी नाभि से एक पौधा उत्पन्न हुआ है जो ऊपर की ओर उठते-उठते आकाश तक पहुँच गया है। 

यह इस सच्चाई का प्रतीक था कि वह पृथ्वी के मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि आकाश के देवताओं को भी धर्म सिखायेगा।

23. तीसरा स्वप्न (Tisra Sapna)

उसने देखा कि बहुत बड़ी संख्या में काले केशधारी और सफेद वस्त्रधारी लोग उसके समीप आ-आकर उसे नमस्कार कर रहे हैं। यह इस बात का संकेत था कि अनगिनत गृहस्थ उसके अनुयायी बनेंगे।

24. चौथा स्वप्न  (Chautha Sapna)

उसने देखा कि भिन्न-भिन्न दिशाओं से चार रंग के पक्षी उसकी गोद में आकर समा रहे हैं और अपना रंग त्याग कर श्वेतवर्णी होते जा रहे हैं। 

यह इस बात का संकेत था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चारों वर्णों के लोग उनकी शरण में आकर वर्ण-भेद से मुक्त हो जायेंगे।

25. पांचवां स्वप्न  (Pachwa Sapna)

उसने देखा कि सारी पृथ्वी गंदगी से भरी हुई है और वह उस पर विचरण कर रहा है। परंतु पृथ्वी की यह गंदगी उसके चरणों को भी नहीं पा रही है। 

वह सांसारिक अपवित्रता के बीच सदा परम पवित्र बना रहेगा। सर्वथा निर्दोष और निर्मल बना रहेगा।

26. सुजाता की खीर (Sujaata ki Kheer)

भाग्यशालिनी सुजाता को उरुवेल के विशाल वटवृक्ष के प्रति बहुत श्रद्धा थी। हर वैशाख पूर्णिमा को वह इस वृक्ष-देवता की पूजा किया करती थी। 

उसे विश्वास था कि इसी देवता के आशीर्वाद स्वरूप उसे पुत्र प्राप्त हुआ। अब उसका विवाह भी कर दिया गया। परंतु सांसारिकता के प्रति उसकी जरा भी रुचि नहीं थी।

वह चाहती थी कि वट-देवता उसके पुत्र की रुचि सुधारे। इसी उद्देश्य से वह वैशाख पूर्णिमा को वट वृक्ष के पूजन के लिए तैयार हुई। 

दासी को भेजा कि वृक्ष के तले की जमीन साफ कर दे ताकि वहां जाकर वह अपने देवता के लिए बनायी हुई उत्कृष्ट खीर उसे अर्पित कर सके।

दासी वटवृक्ष के पास आयी तो देखा कि वहां स्वयं देवता शरीर विराजमान हैं। उसने मालकिन को संदेश दिया।

मालकिन भी प्रसन्नचित्त हो वहां आयी, लेकिन समझदार थी। देखते ही जान गयी कि यह देवता नहीं, कोई युवा गृहत्यागी है जो तपस्या के लिए इस पवित्र स्थान पर आया है। 
उसके मन में वात्सल्यभाव जागा। जो खीर अपने देवता को भेंट करने के लिए लायी थी, वह इस तपस्वी को अर्पित करते हुए उसे आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी तपस्या सफल हो।

सुजाता की यह खीर अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि बोधिसत्व का यह अंतिम भोजन था। 

इसके बाद तो बोधिसत्व सम्यक संबुद्ध बनने वाले थे इसलिए जिस भोजन के आहार से उन्हें सम्यक संबोधि प्राप्त हुई क्या कहना! उसके महत्त्व का क्या कहना!

27. मार पराजित (Maar paraajit)

नीचे अवीचि नरक लोक से लेकर ऊपर अरूप ब्रह्मलोक का सारा क्षेत्र मार का ही है, मृत्यु राज का ही है। 

यहां जो प्राणी जन्म लेता है वह देर-सवेर मृत्यु को प्राप्त होता ही है जब तक कोई तपस्वी देवलोक को अमर मान कर तपस्या करता है अथवा रूप या अरूप ब्रह्मलोक को अमर मान कर तपस्या करता है, तब तक मारक्षेत्र का यह सम्राट मृत्युदेव मार प्रसन्न रहता है।

परंतु जब कोई व्यक्ति अनित्यधर्मा अरूप ब्रह्मलोक से परे नित्य, शाश्वत, लोकातीत अवस्था को प्राप्त करने के लिए तपस्या करता है तब यह विचलित हो जाता है। वह नहीं चाहता कि कोई भी व्यक्ति उसके साम्राज्य क्षेत्र से बाहर निकले।

अतः जब उसने देखा कि बोधिसत्व बोधिवृक्ष के नीचे वैठा हुआ इसी उद्देश्य से तप कर रहा है तब उसका तप भंग करने के लिए वह अपनी विशाल भयानक सेना के साथ स्वयं भी आ पहुँचा। 

बोधिसत्व को विचलित करने के लिए उसने अनेक प्रयत्न किये परंतु वह नितांत अविचल रहा। अतः मार पराजित होकर वापस लौट गया।

28. सम्यक संबोधि (Samyak Sambodhi)

अब वातावरण शांत हो चुका था। वैशाख पूर्णिमा की रात के चंद्रमा की शीतलता चारों ओर छायी हुई थी। 

बोधिसत्व अपनी साधना में लीन था। वह उसकी खोज में था जो लोकीय क्षेत्र के परे है। जो नित्य, शाश्वत, लोकातीत क्षेत्र है।
जहां जन्म नहीं, मृत्यु नहीं उसका साक्षात्कार कैसे हो? क्या विधि अपनाये? 
खोजते-खोजते मन से जुड़ी हुई शारीरिक संवेदनाओं की अनुभूति होने लगी। विपश्यना जाग उठी।

इनको समताभाव से देखते-देखते. जिसकी खोज थी वह अवस्था प्राप्त हो गयी। 

यही बोधिसत्व की सम्यक संबोधि थी। कल्पा तक पारमिताओं को पूरा करते-करते जिसे प्राप्त करना था अतत उसमें सफल हुआ। 
बोधिसत्व सम्यक संबद्ध बना। उसके राग, क्षे और मोह के संपूर्ण संस्कार भग्न हो गये अतः भगवान कहलाया।

29. मार कन्याओं का दुष्प्रयत्न विफल (Maar kanyaon ka dushprayatn viphal)

सम्यक संबुद्ध बोधि वृक्ष के तले अमरत्व के सुख में शांत बैठा रहा।

उधर हारे हुए मार को बहुत उदास देख कर उसकी कन्याओं ने उसे आश्वासन दिया कि भले उनका पिता सफल नहीं हुआ, पर वे सफल होंगी और तपस्वी को उसकी तपस्या से विचलित कर देंगी। 

वे सम्यक संबुद्ध के सामने पहुंचीं। 
भिन्न-भिन्न प्रकार की आकर्षक भाव-भंगिमाओं से और नृत्य-गीत से उसे आकर्षित करने का प्रयत्न किया। 
पर वे भी असफल रहीं और निराश होकर अपने पिता के पास वापस लौट गयीं।

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Gautama Buddha stories

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30. तपुस्स और भल्लिक (Tapuss aur Bhallik)

सम्यक संबुद्ध बोधिमंड के क्षेत्र में ही सात सप्ताह तक मोक्ष सुख का अनुभव करते हुए विराजमान रहे। उस समय ब्रह्मदेश का सौभाग्य जागा। 

उस देश के दो व्यापारी तपस्या और भल्लिक व्यापार के सिलसिले में भारत आये हुए थे और इसी प्रदेश से रहे गुजर थे। 
उन्होंने सम्यक संबुद्ध को देखा तो श्रद्धाविभोर होकर उन्हें नमन किया और अपने साथ लाये हुए म्यांमार के चावल-मधु से बने लड्डू उन्हें अर्पित किये।

सुजाता की खीर के बाद सात सप्ताह बीतने पर सम्यक संबुद्ध का यह पहला भोजन था। 

तपस्या और भल्लिक भाग्यशाली हुए। उन्हें भगवान ने पंचशील दिये और उनके आग्रह पर अपने सिर के आठ के-अच्छे दिया जिन्हें लेकर वे अपने देश लौट। व
हां के शासक और निवासियों ने अत्यंत श्रद्धा पूर्वक उन्हें श्वे-डगान पर्वत पर स्तूप बना कर सन्निधानित किया। म्यांमार का भाग्य जागा।

31. कृतज्ञ संबुद्ध (Krtagy sambuddh)

(उपक) सम्यक संबुद्ध के मन में कृतज्ञता जागी और विपश्यना का यह अनमोल रत्न अपने प्रथम दो आचार्यों आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त को देना चाहा, लेकिन देखा कि वे दोनों मृत्यु को प्राप्त होकर अरूप ब्रह्मलोक में जन्मे हैं। वहां शरीर नहीं होता, केवल चित्त होता है।

विपश्यना के लिए शरीर और चित्त दोनों का संयोग आवश्यक है। तब यह कल्याणकारी विद्या किसे दे? 

कृतज्ञता का भाव उन पांच ब्राह्मण ज्योतिषियों के प्रति जागा, जो पिछले छः वर्षों तक उनके साथ तपस्या करते हुए, उनकी सेवा करते रहे।

किसी भ्रमवश अंत में उन्हें छोड़ कर चले गये ध्यान से देखा तो पाया कि वे वाराणसी के इसिपत्तन मृगदाव में ठहरे हुए हैं। 

अतः उस ओर चल पड़े। 
रास्ते में उपक नामक एक नग्न आजीवक मिला जो उनके चेहरे की आभा देख कर बहुत प्रभावित हुआ और यह जान कर प्रसन्न हुआ कि यह व्यक्ति जिन हो गया है, सम्यक संबुद्ध हो गया है।
उसने पूछा कि किस गुरु की शिक्षा से आप सम्यक संबुद्ध है? भगवान ने उत्तर दिया- ‘मेरा काई गुरु नहीं। जो स्वयं बुद्ध होता है वही संबुद्ध कहलाता है। 
उसका कोई गुरु नहीं होता। 
उपक को यह बात समझ में नहीं आयी। वह मुह मांड कर चल दिया। लेकिन बहुत वर्षों बाद वह फिर भगवान के पास आया और उनसे विपश्यना विद्या सीख कर मुक्त अवस्था प्राप्त की।

32. धर्मचक्रप्रवर्तन (Dharm Chakr Pravartan)

भगवान अपने पांच साथियों को धर्म बांटने के लिए मृगदाव यानी आज के सारनाथ पहुँचे। एक बार तो उन साथियों के मन में आया कि यह व्यक्ति तपभ्रष्ट हो चुका है। 

इससे हम क्या सीखेंगे?

परंतु समीप आने पर उसके मुखमंडल की अपूर्व तेजस्विता देख कर विश्वास हो गया कि इसे अवश्य सम्यक संबोधि प्राप्त हो गयी है। 
तब भगवान ने उन्हें धर्मदेशना दी। आषाढ़ पूर्णिमा की सुहावनी संध्या का समय था।

उस समय जो पहली बार धर्मप्रकाशन किया, वह धर्मचक्रप्रवर्तन कहलाया। भगवान ने समझाया कि कैसे पतियों से बच कर उन्होंने जो मध्यम मार्ग अपनाया, उसी से मुक्ति का मार्ग स्पष्ट हुआ। 

शील, समाधि, प्रज्ञा का आठ अंगों वाला विपश्यना मागे प्रकट हुआ, जिसे धारण करके कोई भी जन्म-मरण के भवसंसरण से मुक्त हो सकता है। 
भगवान के पांचों साधक इसी विपश्यना के माग पर चल कर अरहंत हुए, मुक्त हुए।

33. यश और उसका पिता (Yash Aur Uska Pita)

प्रातःकाल भगवान के संक्रमण करते समय इसिपत्तन मृगदाव के बाहर से आवाज आयी हाय दुःख, हाय संताप | भगवान ने उसे पहचाना। 

वह यश था, उस सुजाता का पुत्र जिसने उन्हें संबोधि प्राप्त होने के पहले खीर का दान दिया था। 
भगवान ने उसे भीतर बुलाया, विपश्यना धर्म सिखाया, जिससे उसका दुःख दूर हुआ, संताप दूर हुआ, सुख मिला। 
वह स्रोतापन्न हो गया।

इसी समय यश को खोजता हुआ उसका पिता वहां आ पहुँचा। 

भगवान ने उसे भी उपदेश दिया। 
वह भी उपदेश सुनते-सुनते, विपश्यना करते-करते श्रोतापन्न अवस्था को प्राप्त हुआ और इसी उपदेश को सुनते-सुनते यश अरिहंत अवस्था को प्राप्त हुआ।

34. पिता के घर भोजन (Pita ke Ghar Bhojan)

यश के पिता ने यश सहित भगवान को अपने यहां भोजन के लिए आमंत्रित किया। वहां भगवान ने यश की माता को और उसकी पूर्व पत्नी को यही धर्ममयी विपश्यना सिखायी । 

वे भी स्रोतापन्न हो गयीं। 
पांच ब्राह्मण साथियों के बाद वैश्य समाज का यश पहला व्यक्ति था जो अरहंत हुआ और उसके माता-पिता और उसकी पूर्व पत्नी पहले गृहस्थ थे जो स्रोतापन्न हुए।

यश के व्यापारी समाज के 54 मित्र थे। 

उन्होंने यश में जो परिवर्तन देखा तो वो भी भगवान की शरण आये और विपश्यना साधना करते हुए अरहंत अवस्था प्राप्त कर ली। दुःखमुक्त हो गये. संतापमुक्त हो गये।

35. जाओ धर्मदूतो, धर्मप्रचारण के लिए विचरण करो (Jao Dharmadooto, Dharmaprachaaran Ke Liye Vicharan Karo)

भगवान के अतिरिक्त ६० अन्य अरहंत हो गये भगवान ने उन्हें धर्मप्रचारण के लिए बाहर जाने की प्रेरणा दी। भगवान ने उन्हें धर्म सिखाया था। बौद्ध धर्म नहीं। 

इन शिष्यों को भी धर्म सिखाने भेजा, बौद्ध धर्म नहीं। शील, समाधि और प्रज्ञा का सार्वजनीन धर्म जो आदि में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अंत में कल्याणकारी है। 
यहां कि उसे अपने जीवन में उतारते हुए लोगों को धारण करना सिखाएँ। 
बहुजन हित-सुख के लिए धर्म का यही संदेश भिजवाया। सार्वजनीन धर्म फैलने का शुभ आरंभ हुआ।

36. उरुवेल की कुटिया (Uruvel Ki Kutiya)

में क्रुद्ध नागराज साठ अरहंत धर्मदूतों को भिन्न-भिन्न स्थानों में धर्म सिखाने भेज कर, स्वयं इसी उद्देश्य से उरुवेल के वनप्रदेश में जा पहुंचे। 

वहां निरंजरा नदी के तट पर उरुवेल काश्यप अपने ५०० जटाधारी शिष्यों के साथ हवन-यज्ञ के कर्मकांडों में निरत था। 
भगवान ने उसे कहा कि तुम्हारे आश्रम में स्थान हो तो मैं कुछ समय यहां बिताऊं। 
काश्यप नहीं चाहता था कि कोई श्रमण उसके आश्रम में ठहरे। परंतु टालने के लिए उसने कह दिया कि केवल एक कुटिया खाली है। 
चाहो तो उसमें रात बिता सकते हो। परंतु उसमें बहुत भयंकर नाग रहता है। 
जो उस कुटिया में जाता है, उसे डस लेता है। भगवान अभय थे। भगवान ने कहा मैं निश्चित होकर उस कुटिया में रहूंगा। वहां जाकर जैसे ही ध्यान के लिए बैठे कि करता हुआ भयंकर क्रुद्ध नागराज प्रकट हुआ। 
भगवान ने विपश्यना के बल पर समता बनाये रखी और मैत्री की तरंगें जगाने लगे। क्रुद्ध नागराज का क्रोध शांत हो गया। 
नागराज भगवान के सामने मैत्री की तरंगों से अभिभूत होकर शांत लेटा रह गया। 
सुबह लोगो ने देखा तो आश्चर्यचकित रह गये।

37. मिथ्या अरहंत (Mithya Arahant)

कालनाग की घटना के बाद १४ अन्य अवसरों पर भगवान ने धर्मबल का आश्चर्यजनक परिचय दिया। 

तिस पर भी उरुवेल काश्यप अपने मिथ्या अभिमान में डूबा रहा और समझता रहा कि मैं अरहंत हूं, जब कि यह व्यक्ति अरहंत नहीं है। 
भगवान ने उसे समझाया कि अरहंत क्या होता है |

शील में प्रतिष्ठित हो जाय और फिर चित्त को एकाग्र करके प्रज्ञामयी विपश्यना के बल पर विकारों से नितांत छुटकारा पा ले, तभी अरहंत होता है।

उरुवेल काश्यप भगवान द्वारा बतायी हुई विधि के अनुसार विपश्यना करता हुआ सही अरहंत हो गया। अब वह मिथ्या अरहंत नहीं रहा।

उसे मुक्त हुआ देख कर उसके ५०० शिष्यों ने भी भगवान की सिखायी हुई विपश्यना का अभ्यास किया और वे भी अरहंत हो गये, मुक्त हो गया अब उन्हें अपनी जटाएं भार लगने लगीं। 

उन्होंने उन्हें काट कर निरंजना नदी में बहा दिया।

38. सही अरहंत हुए (Sahi Arahant Hue)

निरंजना नदी के तट पर ही, कुछ दूरी पर उरुवेल काश्यप का छोटा भाई नदी काश्यप अपने ३०० शिष्यों के साथ, और उससे कुछ और आगे दूसरा भाग गया काश्यप अपने २०० शिष्यों के साथ, अग्नि तपश्चर्या में लीन थे। 

वे सभी अपने आपको अरहंत मानते थे।

उन्होंने देखा कि निरंजना नदी में सिर की जटाओं और चेहरों के बालों के गुच्छे तिरते हुए चले आ रहे हैं।

उन्होंने जानकारी की तब मालूम हुआ कि उनका बड़ा भाई अपने 500 शिष्यों के साथ भगवान का शिष्य हो गया है और उन्होंने सिर तथा दाढ़ी को मुंडित करके उन्हें नदी में प्रवाहित कर दिया है।

इसे देख कर अन्य दोनों भाइया ने भी अपने शिष्यों के साथ भगवान की विपश्यना साधना स्वीकार की; शील, समाधि और प्रज्ञा में प्रतिष्ठित हुए, सही अरहंत हुए और मुक्त हो गये। वे भी मुंडित होकर भगवान के श्रद्धालु शिष्य हो गय।

39. मगध में पुनरागमन (Magadh Mai Punar aagaman)

बोधिसत्व की अवस्था में भगवान जब राजगीर गये थे उन्होंने राजा बिंबिसार को वचन दिया था कि संबोधि प्राप्त करने पर वे पुनः वहां अवश्य आयेंगे। 

अतः अब वे अपने शिष्यों के साथ वहां पहुंचे। राजा बिंबिसार ने दरबारियों और नगर के प्रसिद्ध लोगों के साथ उनकी अगवानी की।

उन्हें नमन किया। कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ कि उरुवेल काश्यप जैसा आचार्य क्या भगवान का शिष्य हो गया है अथवा भगवान बुद्ध के शिष्य हो गये हैं? 

काश्यप ने सब के सामने यह स्पष्ट किया कि मैंने भगवान की बतायी हुई विपश्यना साधना का अभ्यास करके शील, समाधि, प्रज्ञा में प्रतिष्ठित होकर राग और द्वेष से नितांत छुटकारा पा लिया है। 
अतः मैं, मेरे भाई और हमारे सभी साथी सही माने में अरहंत हो गये हैं। हम सब भगवान के शिष्य है।

40. सारिपुत्त और मोगल्लान (Saariputt Aur Mogallaan)

उपतिस्स और कोलित बचपन के मित्र थे आगे जाकर दोनों सारिपुत्त और मोग्गल्लान के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

सारिपुत्त एक दिन राजगीर में भिक्षाटन के लिए निकला तब देखा कि अरहंत अश्वजित शांतचित्त से, नजर नीची किये हुए, चले जा रहे हैं। 
जहां वे रुके वहां उनसे मिल कर कहा कि लगता है जो प्राप्त होना चाहिए वह आपको प्राप्त हो गया है।

बताइये आपने कौन-सी तपस्या की जिससे यह अवस्था प्राप्त हुई? 

उसके बार-बार आग्रह करने पर अश्वजित ने जो कुछ संक्षेप में बताया, उसको सुनते-सुनते सारिपुत्र की पूर्व जन्म की पारमिताओं के कारण विपश्यना जाग उठी और वह वहीं स्रोतापन्न हो गया। 
अब उसने अपने मित्र महामोग्गल्लान के पास जाकर इस विद्या की व्याख्या की, जिसे सुनते-सुनते वह भी स्रोतापन्न हुआ।

दोनों ने आचार्य संजय के साथ काम करने वाले उसके २५० साथियों को सूचित किया आर उन्हें भी अपने साथ भगवान के पास ले गये। आचार्य संजय नहीं गया। 

सारिपुत्त, महामोग्गल्लान और उनके ये २५० मित्रों ने भगवान के बताय हुए विपश्यना मार्ग पर चलते हुए अरहंत अवस्था प्राप्त कर ली।

निष्कर्ष:

तो आज अपने Sabse Bhadiya Kahaniya | मैं भगवन बुद्धा का जीवन मैं उनकी दूरदृष्टि का पता चल हे गया होगा। यहाँ से गौतम बुद्धा कि  Life Story का दूसरा चरण भी समाप्त हुआ। 

और गौतम बुद्धा जी अपने और दुसरो क जीवन को सार्थक और आध्यात्मिक बनाने क लिए अपने प्रयास मैं  पूरी तरह से अपने आप को झोक डाला।  
अगले story सीरीज मैं हम उनके आगे क जीवन क बारे  मैं आपको बताएँगे। आपको मेरा यह प्रयास केसा लगा मुझे comment section मैं  जरूर बताये।

धन्यवाद 🙏

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