Devotional Hindi Gautam Buddha Life Stories | Gyaan (Part 4)

 Gautama Buddha Stories Thoughts |Teacher (Part 4) 

Sabse Bhadiya Kahaniya | नमस्कार दोस्तों आशा है आप सब अच्छे होंगे। यह series Gautama Buddha की पूरी जीवन पर है। हर article मैं  20 कहानियाँ (stories) होंगी।  और यह कहानियाँ आपको बुद्ध (Buddha) भगवान के चरित्र और उनके कर्तव्य क बारे मैं बताएंगी। 
यह चौथा PART है। यह कहानियाँ मैंने छोटे मैं समझाने का प्रयास किया है ताकि आप छोटे मैं हे बोहोत कुछ समज सके। 
तो बिना कोई देर किये चैलिये शुरू करते है। Gautam Buddha on God

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 Gautama Buddha Stories

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61. बोधिराजकुमार 

कौशबी का बोधिराजकुमार भगवान के प्रति अत्यंत श्रद्धालु था । 

उसने अपने लिए एक नया महल बनवाया और गृहप्रवेश के अवसर पर संघ सहित भगवान को भोजन के लिए आमंत्रित किया । भगवान समय पर आ पहुँचे ।

बोधिराजकुमार महल के नीचे उनकी अगवानी के लिए खड़ा था । 

भगवान के आते ही उसने नमस्कार किया और कहा कि महल पर चढ़ने के लिए जो सीढियां हैं उन पर सफेद गलीचे बिछाये हुए हैं । 
कृपया भगवान उन पर चल कर हमें कृतार्थ करें । भगवान रुक गये ।

उन्होंने समझाया कि धर्म सिखाने वाला व्यक्ति यदि इस प्रकार के मान – सम्मान को महत्व देगा तब धर्म क्या सिखायेगा । 

उपासक भी मान – सम्मान को महत्त्व देकर धर्म को भूल जायेंगे । 
इसलिए भगवान ने यह नियम बनाया कि वर्तमान के और भावी पीढ़ियों के धर्माचार्य भी कभी लाभ – सत्कार के लिए, मान सम्मान के लिए धर्म का शिक्षण नहीं दें ।

62 ब्राहाण 

मागण्डिय कुरु प्रदेश का कम्मासम्म निगम । 

वहां का निवासी ब्राहाण मागलिया उसकी पुत्री मागण्डिया सर्वांग सुंदरी थी । 
बाहाण चाहता था कि ऐसे ही किसी सुंदर व्यक्ति को वह अपनी पुत्री का हाथ थे । उसने भगवान बुद्ध को देखा तो बड़ा भावुक हुआ । 
अपनी पत्नी से कह कर अपनी पुत्री को यहाँ बुलवाया और भगवान से आग्रह करने लगा कि आप मेरी इस पुत्री को स्वीकारिये । 
जब वह बार – बार आग्रह करता रहा तब भगवान ने कहा कि मैं गृहस्थ जीवन से मुक्त हो चुका हूं ।

मैं बीतकाम हूँ, वीतराग हूँ । 

आपकी पुत्री से कैसे विवाह कर सकता हूं ? जब फिर भी ब्राह्मण बार – बार जिर करता रहा तब भगवान ने कहा मैं अरहंत ई . सम्यक संबुद्ध है । 
सम्बोधि प्राप्त करने पर मार की तीन देव – पुत्रियों ने मुझे अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कितने प्रयत्न किये पर मेरे मन में रंचमात्र भी वासना नही जागी । अरे, यह तो भिन्न – भिन्न गंदगियों से भरा हुआ मानवी शरीर है । ब्राह्मण !

इसे तो मैं पांव से भी नहीं छू सकता ।

मागण्डिया को अपने रूप का बड़ा अभिमान था । उसे लगा कि भगवान ने उसके रूप का घोर अनादर किया है ।
आगे जाकर वह कोशांबी नरेश उदयन से ब्याही गयी । परंतु उसके मन में भगवान के प्रति द्वेष कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही ।

63. गालियों की बौछार 

कौशांबी के सेठों के बुलावे पर भगवान वहां पहुंचे । मागण्डिया को यह नहीं सुहाया । 

उसे याद आया कि भगवान ने उसके रूप का अपमान किया था । उसे इस बात का बड़ा दुःख हुआ था । 
तभी से उसने भगवान से बैर बांध लिया । जब भगवान कौशांबी आये तब उसने कुछ गुंडों को धन दे करके भगवान बुद्ध के पीछे लगाया ।

उन्होंने भगवान पर गालियों की बौछार करनी शुरू कर दी- ‘ तू चोर है, तू मूर्ख है, तू मूढ़ है, तू ऊंट है . तू बैल है . तू गधा है । तू नरकवासी है । 

तुझे सद्गति नहीं, दुर्गति ही है । भगवान ने लोगों को विपश्यना सिखायी और अप्रिय से अप्रिय स्थिति में समता कायम रखना सिखाया । 
जो सिखाया उसका स्वयं भी पालन किया । 
इन गालियों का उन पर कोई असर नहीं हुआ । भले इससे मागण्डिया का गुस्सा और भड़का और उसने अपना अनर्थ ही कर लिया ।

64. नदी स्नान से पाप नहीं धुलते 

सुंदरिक भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से कहा, गौतम !

क्या आप स्नान के लिए बाहुका नदी चलेंगे ? 
भगवान ने उत्तर दिया, ब्राह्मण, बाहुका नदी में स्नान करने से क्या होता है, वह क्या करेगी ? 
यदि दुष्कर्म किये हैं तो उन्हें नदी का पानी नहीं धो सकता । कर्मों के फल को स्वयं ही भोगना पड़ता है । 
नदी में नहाने के बजाय विपश्यना द्वारा अपने भीतर धर्म की गंगा में स्नान करो और अपने चित्त को निर्मल करो ।

एक अन्य घटना । दासी पूर्णा भगवान की परम श्रद्धालु भी । एक दिन उसने देखा कि एक ब्राह्मण उस सर्दी में नदी के ठंडे पानी में डुबकी लगा रहा है । 

पूछने पर उसने उत्तर दिया कि इससे मेरे पाप – कर्मों से मुझे मुक्ति मिलेगी । इस पर पूर्णा दासी ने ब्राह्मण को फटकारते हुए कहा कि अरे, यह तो घोर अज्ञान है । 
यदि पानी में स्नान करने से पापकर्मो से मुक्ति हो जाय तब तो ये सभी जलचर निश्चित रूप से स्वर्गगामी हो जायें ।

यह सुन कर ब्राह्मण को होश आया और वह सन्मार्ग पर लग गया । 

भगवान के संपर्क में आ करके उसने धर्म को भलीभांति समझ लिया । सुंदरिक भारद्वाज विपश्यना के अभ्यास में लग गया और अपना कल्याण साध लिया ।

65. भगवान का एकांतवास 

कोशांबी भिक्षुसंघ के भिक्षुओं में आपसी कलह हो गया । संघ में फूट पड़ गयी । भगवान ने सुना तो कलह मिटाने के लिए चले आये । 

परंतु जब वे भी कलह मिटाने में असफल रहे तब उन्हें छोड़ कर चल दिये । उन्होंने कुछ दिन अकेले एकांत में बिताने का निर्णय किया । 
वे निर्जन पारिलेय्यक रक्षित वनखंड में एक भद्रशाल वृक्ष के नीचे एकांत में सुख से विहार करने लगे । 
उन्हीं दिनों अन्य हाथियों, हथिनियों और उनके बच्चों से तंग आया हुआ एक वृद्ध हाथी एकांत ढूंढता हुआ वहीं आ पहुँचा ।

भगवान के विहार से वायुमंडल में अपरिमित मैत्री की तरंगें समायी हुई थीं । 

उसे वह स्थान बहुत भाया । जब तक भगवान वहां थे उनकी सेवा में अपने सूंड से कुछ फल और पानी ले आता । 
यो एकांतसुख के साथ भगवान के सानिध्य का सुख भी प्राप्त करता । वह भाग्यशाली हुआ ।

66. कसि भारद्वाज 

जैसे आज वैसे ही उन दिनों भी किसी हट्टे – कट्टे जवान व्यक्ति को भीख मांगते देख कर लोग ताने कसते थे कि तुम मेहनत – मजदूरी करके अपना पेट क्यों नहीं भरते ? 

ऐसी ही एक घटना भगवान के जीवनकाल में हुई । 
ब्राह्मण कसि भारद्वाज एक किसान था । भगवान उसके यहां भिक्षा के लिए गये । तब उसने भगवान को इसी प्रकार कोसा । भगवान ने कहा कि मैं भी किसान हूं ।

जोतता हूं, बोता हूं और जोत – बो कर ही खाता हूं । ब्राह्मण के पूछने पर उन्होंने उसे समझाया कि उनकी जो तपस्या है, जो संयमित जीवन है, वही उनकी खेती है । 

अरहत्व अवस्था प्राप्त करके उन्होंने जो फल प्राप्त किया है वही उनकी खेती की उपज है । 
ब्राह्मण बुद्धिमान था । भगवान की वाणी को समझते देर नहीं लगी । 
वह भगवान का अनुगामी होकर विपश्यना साधना में लग गया । समय पाकर उसने अरहंत अवस्था प्राप्त कर ली ।

67. वेरंजा 

वेरंजा ब्राह्मणग्राम का वेरंज ब्राह्मण भगवान का अत्यंत विरोधी था । 

एक बार भगवान का धर्म – प्रवचन सुन कर अत्यंत प्रभावित हुआ और अगला वर्षावास ब्राह्मणग्राम में बिताने के लिए आमंत्रित किया । 
भगवान ने स्वीकार किया । समय पर वे भिक्षुसंघ सहित वेरंजाग्राम पहुँचे । 
परंतु तबतक वेरंज भूल गया था कि उसने भगवान को आमंत्रित कर रखा है । वह वहां के निवासियों को भी यह नहीं बता पाया था कि बुद्ध के संबंध में उसकी सारी शंकाएं दूर हो चुकी हैं ।

अतः शंकालु निवासियों ने भिक्षुसंघ को भिक्षा नहीं दी ।

उस समय संयोग से घोड़ों के कुछ व्यापारी वेरंजाग्राम में टिके हुए थे, जिनके पास घोड़ों को खाने के लिए लाया हल्के किस्म का अनाज था । वही वे भिक्षुओं को दान में देते, जिसे ओखल में कूट कर वे खाते । 
भगवान भी वही आहार ग्रहण करते ।

वर्षावास पूरा होने पर नियमानुसार भगवान भिक्षुसंघ सहित वेरंज ब्राह्मण के घर पहुंचे । उन्हें पहचानते ही उसे अपनी भूल याद आयी । 

क्षमायाचना करते हुए उसने दूसरे दिन भोजन के लिए आमंत्रित किया । भगवान ने स्वीकार किया । 
उसने बहुत उत्तम भोजन परोसा । भिक्षुओं ने उसे भी उसी अनासक्तभाव से ग्रहण किया, जैसे कि घोड़े का अन्न ग्रहण किया था । भगवान प्रसन्न हुए ।

68. पटाचारा 

श्रावस्ती के महाधनी सेठ की पुत्री । युवावस्था में ही अपने युवा नौकर के साथ कुसंगति में पड़ने के कारण भटक गयी और घर में जो धन हाथ लगा, उसे बटोर कर उसके साथ भाग गयी । 

दोनों एक दूर गांव में जा बसे । लाया हुआ धन समाप्त हुआ तब वे विपन्न हुए । 
ऐसी अवस्था में उसने एक – एक करके दो पुत्र जने । वह अपने पीहर जा रही थी कि रास्ते में पति और दोनों पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए ।

ऐसी दुरावस्था में वह श्रावस्ती पहुँची । वहां श्मशानघाट में चिताएं जलती देख कर पूछा तब मालूम हुआ कि उसके माता – पिता और भाई तीनों, मकान गिर जाने से उसमें दब कर मर गये हैं । 

अब संसार में उसका कोई नहीं रहा । वह पागल हो गयी और सड़कों पर नग्न घूमने लगी । भाग्य से भगवान के संपर्क में आयी ।

भगवान की वाणी से उसे होश आया । किसी ने उस नग्न नारी पर कपड़ा ओका दिया । तब से वह पटाचारा कहलाने लगी । 

होश आने पर वह भिक्षुणी हुई और भगवान के बताये मार्ग पर चल कर अरहंत अवस्था तक पहुंची । अपना शेष जीवन दुखियारी नारियों को विपश्यना सिखा कर उन्हें दुखमुक्त करती रही ।

69. किसा गोतमी 

इस युवती का छोटा इकलौता बेटा मृत्यु को प्राप्त हो गया । इससे वह पागल हो गयी और उसकी लाश लेकर भगवान के पास पहुंची कि वे इसे जीवन प्रदान करें । 

भगवान समझ रहे थे कि इस अवस्था में यह दुखियारी कोई उपदेश नहीं समझ सकेगी । 
इसलिए उन्होंने कहा कि किसी भी घर से चुटकी भर सरसों के दाने ले आ । परंतु ऐसे घर से लाना, जहां किसी की मृत्यु न हुई हो ।

वह सारे नगर में चक्कर लगाते – लगाते थक कर चूर – चूर हो गयी, लेकिन उसे ऐसा एक भी घर नहीं मिला, जहां कभी कोई न मरा हो । 

तब लौट कर उसने भगवान का उपदेश सुना । 
उसे समझ में आया कि मृत्यु से कोई नहीं बचता । विपश्यना करती हुई उसने स्वयं अरहंत अवस्था प्राप्त की और अनेक दुखियारी महिलाओं को विपश्यना का प्रशिक्षण देकर उन्हें दुखमुक्त करती रही ।

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Gautam Buddha Life Stories

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७०. सही यज्ञ 

खानुमत के स्वामी कूटदंत के यहां एक महान यज्ञ का आयोजन था । 

संयोग से भगवान भी उस समय वहां पहुंचे । वह उनसे मिला और पुरातनकाल के शुद्ध यज्ञों के बारे में भगवान से पूछा । 
तब भगवान ने उसे जा समझाया उससे उस होश आया कि पशुबलि धर्मविरोधी क्रिया है । विशेषकर गोहत्या तो बहुत ही बुरी है ।

इसलिए उसके यहां बलि के लिए जो सैकड़ों पशु एकत्र किये गये थे, उन्हें उसने छोड़ दिया और बड़े प्यार से कहा कि अब सब हरी – हरी घास चरें और ठंडा पानी पीयें । 

यह शुभ कार्य पूरा करके वह भगवान का शरणागत उपासक हुआ । 
उनके बताये शील, समाधि और प्रज्ञा की विपश्यना के पावन यज्ञ में लग गया । कूटदंत ब्राह्मण धन्य हुआ ।

करना समझिये । यान में बैठा हुआकाड़ का डडा उठाऊ तो उसे आप मेरा यान से उतरना समझिये । 

और मैयान में बैठा हाथ उठाऊ तो आप उसे मेरा सिर से अभिवादन स्वीकार करें । 
सोणदंड भगवान का शिष्य हुआ पर अभी विपश्यना नहीं सीखी थी । इसलिए उसको अपनी नेतागिरी

७१. सोणदंड : ब्राह्मण बनाने वाले धर्म 

एक बार भगवान अंग देश के चंपा नगर में ठहरे हुए थे । तब स्थानीय ब्राह्मणों का नेता सोणदंड अपने अनेक साथी संगियों सहित भगवान से मिलने आया ।

बातचीत होते – होते भगवान ने पूण कि यदि कोई न शीलवान हो, न प्रज्ञावान तो क्या उसे ब्राह्मण कहेंगे ? 
सोणदंड ने उत्तर दिया कि इन दोनों का होना आवश्यक है । भगवान ने कहा सचमुच शील से प्रज्ञा प्रक्षालित होती है और प्रज्ञा से शील ।

जहां प्रज्ञा है वहां शील है । भगवान के वार्तालाप से प्रसन्न संतुष्ट और प्रभावित होकर सोणदंड भगवान का अनुयायी हो गया । लोगों के सामने वह यह नहीं बताना चाहता था कि यह भगवान का शिष्य हो गया है । 

तब उसने अपनी नेतागिरी बचाये रखने के लिए भगवान से कहा कि यदि में बैठ कर हाथ जोडू तो आप उसे खड़ा होना समझिये । 
अपना साफा उतारू तो उसे मेरा सिर से अभिवादन बचाये रखने की आकांक्षा बनी रही ।

७२. महासाल ब्राह्मण 

भगवान के जीवनकाल में महासाल नाम का एक अत्यंत धनी ब्राह्मण था । 

उसने अपने चार पुत्रों का विवाह करके अपना आधा धन उनको बांट दिया और स्वयं ब्राह्मणी के साथ अलग रहने लगा । 
कुछ वर्षों बाद जब ब्राह्मणी का निधन हो गया तब वह अपने पुत्रों के यहां रहने लगा । वे सभी उसकी खूब सैदा करते ।

लेकिन सब ने उसे फुसला कर उसके पास जो धन बचा था उसे भी बैटदा लिया । अब जबकि उसके पास धन नहीं रहा तब दह पुत्रों को भारी लगने लगा । सब ने उसे दुत्कार दिया । 

वह बेघर हो गया । घर – घर भीख मांग कर अपना पेट पालने लगा । एक दिन दह भगवान के जेतवन दिहार में गया ।

भगवान ने उसे पहचाना और पूछा कि उसकी यह दशा कैसे हुई ? 

ब्राह्मण ने अपनी आपबीती कह सुनायी । भगवान ने करुणचित्त से उसे एक सुझाव दिया , जिसके पालन से उसके पुत्र पुनः उसकी सेवा में लग गये ।

७३. आलवक 

आलवक बहुत बलशाली और दुर्धर्ष व्यक्ति था । एक बार भगवान उसके खुले और सूने भवन में विश्राम के लिए जा बैठे । आलवक आया तो गुस्से में आगबबूला होकर उनसे कहा, श्रमण निकल जा यहां से । 

आवुस, बहुत अच्छा ! कह कर भगवान बाहर निकल गये ।

थोड़ी देर बाद उसने उन्हें फिर भीतर बुलाया और फिर थोड़ी देर बाद बाहर निकाल दिया । 

यो जब तीन बार हो चुका और फिर चौथी बार भगवान को बाहर निकालने लगा तब उन्होंने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया, अब मैं बाहर नहीं निकलता । तुम्हें जो करना हो सो कर लो । 
भगवान के चित्त की दृढ़ता देख कर आलवक ने समझा कि यह कोई सिद्ध पुरुष होगा और कहा मैं तुमसे कुछ प्रश्न पूछूगा ।

यदि तुम ठीक उत्तर नहीं दोगे मैं तुम्हारी छाती चीर दूंगा । 

तुम्हारे पैर पकड़ कर गंगा के उस पार फेंक दूंगा । भगावन अविचल रहे और कहा तुम्हें जो पूछना है . पूछो । 
आलवक ने धर्मसंबंधी कुछ प्रश्न पूछे और उनका उचित उत्तर सुन कर प्रभावित हुआ और भगवान का श्रद्धालु भक्त बन गया । 
उसके ये उद्गार निकले– 
“ अब मैं भगवान सम्यक संबुद्ध और उनके धर्म की सुधर्मता को नमस्कार करता हुआ गांव – गांव और नगर – नगर विचरण करूंगा ।

७४. सदा सुखी 

तथागत हेमंत धातु की भरथराती ठंडी रात थी । चारों दिशाओं से पेड़ों के बीच से ठंडी हवाओं के धोके गुजरते थे । नंगी धरती पर पतझड़ । 

पेडों के कुछ पत्ते गिरे पड़े थे, उन्हीं पर भगवान ठंडा चीवर ओदे हुए बैते थे । पैदल घूमने निकला हुआ राजपुत्र आलवक भगवान की इस प्रकार बैठा देख कर चौंका और उनसे पूज, ‘ क्या आप रात सुख । सोये ? ‘
 ‘ हो, कुमार । सुख से सोया । हर अवस्था में सदा सुख की नींद सोने वाला हूँ । 
जो अरहंत हो गया उसे गर्मा, सरदी का कोई भेद नहीं होता । यह सभी अवस्था में सुखी रहता है । भगवान भी ऐसे ही सदा सुखी रहने वाले थे ।

७५. दो हंडियां 

एक आदमी रोते हुए भगवान के पास आया और कहने लगा, भंते भगवान मेरा चूका बाप मर गया । 

आप उसके लिए कोई कर्मकांड कर दें जिससे उसकी मुक्ति हो जाय । 
भगवान ने कहा, कर्मकांडों से कुछ नहीं होता । 
लेकिन यह भावावेश में था । समझाना असफल होते देख कर भगवान ने कहा कि जा मट्टी की दो हंडिया ले आ । वह खुशी – खुशी ले आया ।

एक में घी भर ले, एक में कंकर – पत्थर भर ले और सील कर दे । 

अब इन्हें तालाब में गहरे पानी में डाल दे । उसने ऐसा ही किया । दोनों हंडियां वजन से नीचे पैदे में बैठ गयीं । 
तब भगवान ने कहा कि एक डंडा लाकर दोनों को फोड़ दे । फोड़ते ही जिसमें घी था, वह पानी के ऊपर तैरने लगा । जिसमें कंकर – पत्थर थे, वे नीचे पैदे में पड़े रह गये ।

भगवान ने समझाया कि क्या किन्हीं कर्मकांडों से यह घी नीचे जा सकता है या ये कंकर – पत्थर ऊपर आ सकते हैं ? उसने कहा, भगवान, यह असंभव है, निसर्ग के नियम के विरुद्ध है । 

तब भगवान ने कहा, अरे ! 
यही तो तुझे समझना है कि तेरे बाप ने जीवन भर कंकर – पत्थर वाले काम किये होंगे तब वह नीचे ही जायगा । घी वाले हल्के – फुल्के काम किये होंगे तब ऊपर ही जायगा । 
जैसे कर्म वैसे फल । प्रकृति के इस अटूट नियम को कोई कर्मकांड नहीं तोड़ सकता ।

७६. अंगुलिमाल 

राह चलते लोगों की हत्या कर – कर के उनकी अंगुलियों की माला अपने गले में पहनने वाला खूखार हत्यारा अंगुलिमाल लोगों के लिए बहुत खतरनाक बन गया था । 

तब भगवान के मन में उस हत्यारे के अति करुणा जागी । 
उसकी दानवी वृत्तियों का दमन करने के लिए वे उसकी ओर गये । पहले उन्होंने जरा ऋद्धिबल का प्रयोग किया ।
भगवान साधारण चाल से चल रहे थे , अंगुलिमाल हाथ में खड्म उठाए पीछे – पीछे बेतहाशा दौड़ा आ रहा था । परंतु उनके समीप नहीं पहुंच पा रहा था । 
दौड़ते – दौड़ते वह थक कर रुका और चिल्ला कर बोला , हे अमण रुक । भगवान ने शांत वाणी से उत्तर दिया , हे अंगुलिमाल मैं तो रुका हूं । 
तू भी तो रुक । प्राणियों की हत्या करते रहने से तेरा भव – संसरण गतिमान है । तू चलायमान है ।

हत्यारे अंगुलिमाल के पास पूर्व जन्म की विपुल पारमिताएं थीं । सद्धर्म की ज्ञानमयी शीतल वाणी सुन कर वह भावविभोर हो उठा । उसका क्रोध शांत हुआ । 

अहंकार टूटा और होश जागा । उसने अपने अस्त्र – शस्त्र समीप की खाड़ी में फेंके और भगवान की शरण में आ गया । भगवान ने उसे विपश्यना सिखायी और वह स्रोतापन हो गया ।

७७. सुंदरिक भारद्वाज सुंदरिक 

भारद्वाज ने एक हवनयज्ञ का आयोजन किया था । 

यज्ञ का प्रसाद बांटने के लिए वह यज्ञमंडप के बाहर निकला । सामने कुछ दूरी पर एक पेड़ के नीचे भगवान बैठे थे । 
सर्दी के दिन थे इसलिए अपने सिर को चीवर से ढक रखा था । वह भगवान के समीप पहुंचा । 
पदचाप सुन कर भगवान ने अपने सिर पर से चीवर खींच लिया । तब वह चौका , अरे यह तो मथमुंडा श्रमण है । उल्टे पांव वापस जाने लगा । 
परंतु फिर उसे ख्याल आया कि आजकल तो बुद्ध के प्रभाव से अनेक ब्राह्मण भी अपना सिर मुड़ाने लगे हैं ।

कौन जाने यह ब्राह्मण ही हो । पलट कर पूछ लिया आपकी जाति क्या है ? भगवान ने कहा, मा जाति पुच्छ, चरणञ्च पुच्छ – जाति नही, आचरण पूछ । 

जाति से आचरण नहीं जाना जाता । 
उसे होश आया । भगवान की वाणी से उसने समझ लिया कि यह वीतरागी है । उनकी वाणी के प्रभावित होकर उनसे उपसंपदा पायी और विपश्यना द्वारा मुक्त अवस्था प्राप्त कर ली । वह धन्य हुआ ।

७८. धर्मदूत पूर्ण सूनापरांत 

( आज के नल्लासोपारा ) का व्यापारी पूर्ण श्रावस्ती गया । वहां सौभाग्य से भगवान के संपर्क में आया । वहीं भगवान की शिक्षा से प्रभावित होकर उसने निश्चय किया कि अपने प्रदेश के लोगों को शुद्ध धर्म सिखाऊंगा । 

यह सोच कर उसने घर लौटने का निर्णय किया । 
इसके लिए वह भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने गया । भगवान ने उसकी परीक्षा लेनी चाही । तब कहा, सूनापरांत के लोग बड़े चंड स्वभाव के हैं ।

उनकी मान्यता के विरुद्ध तुम कुछ भी कहोगे तो वे तुम्हें गाली देंगे, मारपीट करेंगे, पत्थरों से मारेंगे, लाठी से मारेंगे, हथियार से मारेंगे; जान से मारने की धमकी देंगे तब क्या करोगे ? 

पूर्ण ने इन सारे प्रश्नों का जो सहिष्णुता, धैर्य और मैत्रीभरा उत्तर दिया, उससे संतुष्ट होकर भगवान ने कहा, पूर्ण ठीक है । अब तुम अपने प्रदेश में जा करके धर्म सिखाओ । 
यह पूर्ण ही था जो भगवान का शुद्ध धर्म इस प्रदेश में ले आया जो यहां इतना फला – फूला ।

७९. गंधारनरेश पुक्कुसाति 

गंधारनरेश पुक्कुसाति मगधनरेश बिंबिसार का अनदेखा मित्र था । जब उसे यह सूचना मिली कि मगध देश में भगवान विराज रहे हैं तब पूर्व जन्मों की पारमिताओं के कारण उसमें वैराग्य जागा । 

वह राजपाट छोड़ कर भिक्षु वेश धारण करके भगवान से मिलने चल पड़ा । 
लेकिन जब राजगीर पहुंचा तब सायंकाल का समय होने के कारण नगर के दरवाजे बंद हो गये थे । वह बाहर ही किसी धर्मशाला में ठहरा ।

संयोग से उसी दिन देर से आने के कारण भगवान बुद्ध भी दहीं ठहरे । 

रात में दोनों की बातचीत हुई । भगवान से हुई धर्मचर्चा से पुक्कुसाति को विपश्यना मिली और उसे अनागामी अवस्था प्राप्त हो गयी । 
वह भिक्षु बनने के लिए चीवर लेने बाहर गांव में गया तब दहां किसी दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गयी । बिंबिसार अपने अनदेखे नित्र से नहीं मिल पाया परंतु धन्य हुई बिंबिसार की मित्रता, जिससे उसका मित्र महान सद्गति को प्राप्त हुआ ।

८०. अक्कोस भारद्वाज 

आक्रोश भारद्वाज बहुत क्रोधी था । 

जब उसने देखा कि बहुत बड़ी संख्या में लोग भगवान बुद्ध के अनुयायी होते जा रहे हैं तब वह इसे सहन न कर सका और आगबबूला हो कर वेणुवन में भगवान से मिलने आया । 
क्रोध के मारे वह धूज रहा था । उसका हृदय धकधका रहा था । वह क्रोध में भगवान को गालियां बकने लगा ।

भगवान उसकी गालियां सुन कर भी शांत और शीतल बने रहे । जिस समता और मैत्री का उपदेश वे लोगों को देते थे , स्वयं भी उसी का पालन करते थे । 

आक्रोश भगवान को शांत देख कर उनकी ओर आकर्षित हुआ । भगवान से उसने विपश्यना सीखी और क्रोधमुक्त हो गया।

निष्कर्ष:

Gautam Buddha ke Vichar | तो आज अपने Sabse Bhadiya Kahaniya | मैं पढ़ा की गौतम बुद्धा जी ने कैसे लोगो को सच से अवगत कराया और कितनी मुश्किलों का सामना किया जैसे की लोगो के ताने सुने उनकी गालिया सुनी फिर भी वे हार नहीं माने और अपने पथ पर चलते हे रहे। लोगो को शिक्षा उन्होंने दी और कितने हे उपकार किये।

तो आपको यह 20 कहानियाँ किसी लगी कृपया मुझे comment section मैं बताए अब आप लोगो के लिए अगली 20 कहानियों की तैयारी करनी है खोज करनी है।

धन्यवाद 🙏

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