Bhagwan Buddha Life Devotional Hindi Stories | (Part 6)

Best Gautama Buddha Stories in Hindi (Part 6) 


नमस्कार दोस्तों आशा है आप सब अच्छे होंगे। यह series Gautama Buddha की पूरी जीवन पर है। केवल इस article मैं  22  कहानियाँ (stories) होंगी।  और यह कहानियाँ आपको बुद्ध (Buddha) भगवान के चरित्र और उनके कर्तव्य क बारे मैं बताएंगी। 

यह और छठा और आखिरी PART है। यह कहानियाँ मैंने छोटे मैं समझाने का प्रयास किया है ताकि आप छोटे मैं हे बोहोत कुछ समज सके। 

तो बिना कोई देर किये चैलिये शुरू करते है।

और पढ़े: 
Gautam Buddha Life Story Part 1 
Gautam Buddha Life Story Part 2  
Gautam Buddha Life Story Part 3
Gautam Buddha Life Story Part 4  

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Gautama Buddha Stories
चित्र स्रोत: Shutterstock  

१०१. धर्म – समन्वित भगवान के पैर चूमे


कोशलनरेश प्रसेनजित लगभग ८० वर्ष का हो चुका था । भगवान की भी यही उम्र थी । एक बार जब वह भगवान से मिला तब अत्यंत श्रद्धापूर्वक उनके पैर दबाने लगा और चूमने लगा । भगवान ने पूछा , ऐसा क्यों करते हो ? तब उसने कहा , भगवान धर्म – समन्वित हैं । धर्म – समन्वित होने की और भी कई बातें कहीं और उनकी प्रदक्षिणा करके चला गया ।

१०२. विनाशक जातिवाद


शाक्य और कोलिय अपने को उच्च और प्रसेनजित को नीच जाति का मानते थे । प्रसेनजित ने अपनी जाति सुधारने के लिए शाक्य राजकुमारी से विवाह करना चाहा जो उन्हें स्वीकार्य नहीं था । परंतु उसे नाराज भी नहीं कर सकते थे । अतः छल से उन्होंने दासीपुत्री वासभखत्तिया को राजकुमारी घोषित कर उससे विवाह कर दिया । वासभखत्तिया से विडूडभ नाम का पुत्र पैदा हुआ । बड़ा होने पर जब उसे वासभखत्तिया के बारे में सच्चाई का पता चला तब वह क्रोध से आगबबूला हो गया । प्रसेनजित के बाद जब उसने राजगद्दी संभाली तब बदला लेने के लिए शाक्यों पर हमला बोल दिया । यह विषेला जातिवाद ही था जिससे शाक्यों का विनाश हुआ ।


१०३. लिच्छवियों को गणराज्य की सुरक्षा का उपदेश


एक बार भगवान जब वैशाली गये तब वैशाली के लिच्छवियों ने उनसे गणराज्य की स्वतंत्रता और सुरक्षा पर प्रश्न पूछे । भगवान ने गणतंत्र की सुरक्षा के लिए जो सात उत्तर दिये वे किसी भी गणतंत्र की सुरक्षा के लिए सदैव अपरिहार्य हैं ।


१०४. अंबपाली एवं लिच्छवी राजकुमार


अंबपाली भगवान की ओर आकर्षित होकर गणिका के पेशे से दूर हट गयी और भगवान के प्रति अत्यंत श्रद्धालु हो गयी । जब उसने सुना कि भगवान उसके आम्रवन में रुके हैं तब वह उनसे मिली और अगले दिन के भोजन के लिए उनकी स्वीकृति ले ली । लौटते हुए उसे लिच्छवी राजकुमार मिले । वे भी भगवान को भोजन के लिए आमंत्रित करने जा रहे थे लेकिन अंबपाली भगवान को आमंत्रित कर चुकी थी । उन्होंने उस भोजनदान के आमंत्रण को लौटा कर उन्हें देने लिए अंबपाली को एक लाख मुद्राएं देने का प्रस्ताव किया । पर वह कैसे मानती ?

१०५. मातृसेवा



सारिपुत्त ८४ वर्ष के हो गये थे । परिनिर्वाण के लिए केवल एक सप्ताह शेष रह गया था । उन्होंने देखा कि १०० वर्षीया उनकी मां ने अभी तक भगवान की शिक्षा को स्वीकार नहीं किया है । वे अपनी मां के यहां गये और जिस कक्ष में उनका जन्म हुआ था उसमें बैठ कर ध्यान करने लगे । रात होने पर माता ने देखा कि उस कमरे में बहुत प्रकाश फैल गया है । तब उसने इसका कारण पूछा ।

सारिपुत्त ने बताया कि यहां चारों दिशाओं के द्वारपाल राजा आये थे । देवराज इंद्र सहित देवलोक के देवता और ब्रह्मलोक के ब्रह्मा आये थे । वे सब अरहंत के अंतिम दर्शन करने आये थे । मां यह सुनकर हर्षविभोर हुई । मेरा पुत्र इतना ऋद्धिशाली और समृद्धिशाली है तब इसका आचार्य कितना महान होगा ? उसका शरीर पुलक – रोमांच से भर गया । विपश्यना का अनित्यबोध जाग गया । वह स्रोतापन्न हुई । सारिपुत्त ने अपनी माता की अतुलनीय सेवा की ।


१०६. भगवान बुद्ध का सही पूजन


रिब्दों के सम्यक दल जाने से परिवार के सभी लोग प्रसच हुए . कल्याणलाभी हुए । पर उसके ससुराल के लोग उसके विरोधी बने रहे । एस्को से एक था सिद्धार्थ का फुफेरा भाई तिरस । जब बहुत उम्र बढ़ गयी रूप स्पने देखा कि इतनी बड़ी संख्या में लोग बुद्ध के बताये मार्ग पर बलते है ।

क्यो न भी चल कर देखा वह प्राजित हुआ लेकिन उसका अहंकार नहीं छूटा । भगवान ने उसे समझाया और विपश्यना में लगाया । जब ये वैशाली में विहार कर रहे थे तब उन्होंने भिक्षुओं को कहा कि आज से चार महीने पश्चात वे परिनियोग प्राप्त करेंगे । यह सुन कर भिक्षुओं को बास हुआ ।

जो उभी यके नहीं थे , वे भगवान के पास बैठ कर आंसू बहाने लगे । कुछ रे सदा की भाति भगवान को गंधमालाएं अर्पित की । तु मितु शिल्स ने सोचा कि भगवान परिनिवृत्त होने जा रहे हैं । उनके जीवित रहते हुए ही मुझे उरहत्व प्राप्त करना चाहिए । यह सोच कर वह अकेला एकांत में बैठ कर विपश्यना के अभ्यास में लग गया । भगावन ने उसे साधुकार दिया और निशुओं से कहा कि इस माला – गंध से मेरी पूजा नहीं होती । धर्म का प्रतिपादन ही मेरी पूजा होती है ।


१०७. बुद्ध की सही वंदना


८० वर्ष की अवस्था होने पर मार ने उन्हें याद दिलाया कि आपने मुझे कहा था कि जब आपके भिक्षु और भिक्षुणियां , गृहस्थ पुरुष और नारियां धर्म सिखाने योग्य हो जायेंगे तब आप महापरिनिर्वाण ले लेंगे । अब समय आ गया है । आपकी इच्छा के अनुसार धर्माचार्य तैयार हो गये हैं । आपको परिनिर्वाण ले लेना चाहिए । तब भगवान ने तीन माह पश्चात कुशीनगर में महापरिनिर्वाण लेने का निर्णय किया । भगवान जुड़वां शॉल वृक्ष के नीचे लेटे थे । लोग पत्र – पुष्प लेकर वंदना करने आये । तब भगवान ने साधनारत भिक्षुओं की ओर इशारा करते हुए कहा , ” देखो , ये मेरी सही वंदना कर रहे हैं । “

१०८. सुभद्र की प्रव्रज्या


सालवृक्ष के नीचे लेटे परिनिर्वाण की रात भगवान कुशीनारा नगर के बाहर एक जुया थे । लोग उनको नमस्कार करने आते थे । सुभद्र परिव्राजक उनसे धर्म सीखना चाहता था । आनंद ने उसे रोका कि यह उनके महापरिनिर्वाण का समय है । कैसे धर्म सिखायेगी । भगवान ने उनकी बात सुनी तब आनंद को रोका और सुभद्र को बुलाया । उसे थोड़े में धर्म समझाया । आगे जाकर यह दिमश्यता साधना करता हुआ मुक्त अवस्था तक पहुँचा ।


१० ९ . तथागत का पार्थिव शरीर


भगवान के परिनिर्वाण होने के कुछ ही समय पहले आनंद ने भगवान से पूछा कि परिनिर्वाण के बाद हम आप के भौतिक शरीर का किस प्रकार सम्मान करेंगे । भगवान ने कहा कि दाहक्रिया के पश्चात जो देहधातु बचेगी . उन्हें किसी स्तूप में सविधानित कर देना । साधारण लोग वहाँ श्रद्धापूर्वक पत्र – पुष घड़ा कर पुण्यलाभी होंगे लेकिन तुन जैसे साधकों को वहां ध्यान करने का लाभ उठाना चाहिए ।


११०. पहला व दूसरा संगायन


भगवान के महापरिनिर्वाण के तीन माह बाद महाकाश्यप ने राजगीर में ५०० अरहंत भिक्षुओं को ले कर प्रथम संगायन आयोजित किया । इसमें सम्मलित होने वाले सभी भिक्षु अरहंत थे ।

संगायन में आनंद की उपस्थिति आवश्यक थी । अनेक वर्षों से भगवान के निजी सेवक के रूप में रहने के कारण आनंद ने उनके सारे प्रवचन सुने थे और उन्हें याद कर लिया था । आनंद स्रोतापन्न थे अतः संगायन में भाग नहीं ले सकते थे । परंतु रात भर परिश्रम करके वे अरहंत हुए , यों ५०० वें भिक्षु की संख्या पूरी करके , दूसरे दिन प्रातः आरंभ होने वाले सम्मेलन में सम्मिलित हुए ।

दूसरे संगायन के समय भिक्षुसंघ के दो टुकड़े हो चुके थे । भगवान ने भिक्षुओं के लिए जो नियम निश्चित किये थे , उनको अस्वीकार करते हुए अनेक भिक्षुओं ने अपना अलग संगायन किया । परंतु जो परंपरावादी भिक्षु थे उन्होंने विनय के नियमों में कोई परिवर्तन न करके राजा कालाशोक के संरक्षण में द्वितीय संगायन किया । इसमें ७०० भिक्षुओं ने भाग लिया । यह बुद्ध के महापरिनिर्वाण के १०० वर्ष बाद हुआ ।

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Gautam Buddha Life Stories


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१११. हृदय जीतने वाला सम्राट


कलिंग युद्ध की दर्दनाक तबाही देख कर राम्राट अशोक का हृदय बदल गया । तब वह भगवान बुद्ध की शिक्षा के संपर्क में आया । फिर बैराठ जाकर आचार्य उपगुप्त से विपश्यना सीखी । तब उसने यह निर्णय किया कि अब वह युद्ध करके किसी राज्य को जीतने का काम बिल्कुल नहीं करेगा । देश की रक्षा के लिए उसने भारत की पश्चिमी सीमा पर एक मजबूत किला बनवाया और बहुत बड़ी संख्या में सेना स्थापित की ।

यह किसी देश पर हमला करने के लिए नहीं , बल्कि सुरक्षा के लिए थी । अब वह किसी को जीतेगा तो धर्म से ही , प्यार से ही । इसीलिए तीसरा संगायन करके उसने पड़ोसी देशों को सद्धर्म भेजा , विपश्यना भेजी । इसका प्रभाव पड़ोसी देशों पर इतना गहरा पड़ा कि वे आज तक उसे एक आदर्श राजा मानते हैं । वह सही माने में हृदय जीतने वाला सम्राट बना ।

अशोक के बाद १०० वर्ष बीतते – बीतते दुर्भाग्य से देश मे तिपिटक को कंठस्थ रखने वाले भिक्षु नहीं रह गये । विपश्यना सिखाने याले आचार्य भी नहीं रह गये । वे अपनी जान बचा कर पड़ोसी देशों में भाग गये । इस कारण यहां अशोक के संरक्षण में जो तीसरा संगायन हुआ वह भारत का अंतिम संगायन था ।


११२. तीसरा संगायन , सोण और उत्तर


सम्राट अशोक को कलिंग युद्ध के कारण बहुत क्षोभ हुआ । वह भगवान की शिक्षा की ओर मुड़ा । परंतु विपश्यना साधना का अभ्यास करने के लिए वह राजस्थान के वैराठ पहुँचा । वहां आचार्य उपगुप्त से विपश्यना सीखी । परिणामस्वरूप वह स्रोतापन्न हुआ । सम्राट अशोक के संरक्षण में तीसरी धम्मसंगीति आचार्य मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में संपन्न हुई । इस संगायन के पश्चात भगवान की शिक्षा नौ भिन्न – भिन्न देशों में भेजी गयी । सोण और उत्तर दक्षिणी म्यंमा और पश्चिमी थाईलैंड की सुवण्णभूमि गये । न्यमा में बुद्धवाणी और विपश्यना दोनों शुद्ध रूप में वर्तमान समय तक कायम रखी गयी ।


११३. भिक्षु महेंद्र


उनकी माता विदिशादेवी राजकुमार अशोक से ब्याही गयी , लेकिन वह पाटलिपुत्र नहीं गयी । उसने अपने पुत्र कुमार महेंद्र और कुमारी संघमित्रा को वहां भेजा । महेंद्र ने सम्राट अशोक के गुरु भदंत मोग्गलिपुत्त तिस्स से धर्म सीखा और अरहंत अवस्था को प्राप्त हुआ । अशोक ने संघमित्रा का विवाह कर दिया था , जिसको सुमन नामक एक पुत्र भी हुआ था । अशोक ने अपने पुत्र भिक्षु महेंद्र को श्रीलंका में धर्म फैलाने के लिए भेजा ।

श्रीलंका के राजा प्रियदर्शी तिस्स ने निक्षु महेंद्र की हर प्रकार से सहायता की । उसने सम्राट अशोक से भगवान की शरीर धातु मँगवायी , जिसे श्रीलंका में सम्मानपूर्वक स्तूप बना कर सन्निधानित किया गया । अरहंत महेंद्र का शरीर शांत होने पर उनकी अस्थियां भी एक स्तूप बना कर रखी गयीं । ये दोनों स्तूप श्रीलंका में आज तक कायम है ।


११४. भिक्षुणी संघमित्रा


जब अरहंत महेंद्र श्रीलंका में धर्म सिखाने में बहुत सफल हुआ तब वहाँ के राजमहल की महिलाओं ने भी प्रव्रजित होकर भिक्षुणी बनना चाहा । इसलिए अरहंत महेंद्र ने भिक्षुणी संघमित्रा को बुलवाया । संघमित्रा का पुत्र सुमन सात वर्ष की अवस्था में प्रवजित होकर धर्म के अध्ययन में लग गया था । भिक्षु महेंद्र जिन पांच भिक्षुओं को साथ लेकर श्रीलंका गया , उनमें से एक छ : अभिज्ञा संपन्न अर्थात अरहंत ( १५ वर्षीय ) सुमन भी था ।

संघमित्रा का पति अग्गिब्रह्म अशोक के छोटे भाई तिस्स के साथ प्रव्रजित हो गया था । संघमित्रा भी प्रव्रजित होकर दो वर्ष बाद अरहंत अवस्था को प्राप्त हुई । श्रीलंका से मांग आने पर यह वहाँ धर्म सिखाने पहुंची और भिक्षुणीसंघ की स्थापना करके हजारों महिलाओं के मंगल में सहायिका बनी । मृत्यु के बाद श्रीलंका में उसकी अस्थियों को भी पगोडा में सन्निधानित किया गया जो आज भी कायम है ।


११५. चौथा संगायन


चौथा संगायन ई.पू. २ ९ में श्रीलंका के राजा पट्टगामिनी के संरक्षण में भदेत महारक्खित की अध्यक्षता में ५०० तिपिटकघर भिक्षुओं द्वारा सकुशल संपन्न किया गया । इस संगायन में मूल बुद्धवाणी को वहां ताइपत्रों पर लिख लिया गया ताकि वह शुद्ध रूप में बची रहे । इस कारण चौथा संगायन परम कल्याणकारी सिद्ध हुआ ।


११७. दूषित हुए सद्धर्म का सुधार


लगभग २००० वर्ष पूर्व भारत की लगभग सभी परंपराओं में न्यूनाधिक मात्रा में दूषण समा गया था । सद्धर्म भी उससे नहीं बचा । यह दूषण बिहार , बंगाल , मणिपुर और आसाम होता हुआ म्यंमा में भी प्रवेश कर गया था । उस समय की राजधानी पगान इस दूषण का केंद्र बन गया । दक्षिण के मोन राज्य में तिपिटक और विपश्यना दोनों शुद्ध रूप में कायम रहीं । वहां के एक अरहंत भिक्षु धम्मदस्सी पगान आये और उन्होंने राजा अनिरुद्ध को भगवान की असली शिक्षा का बोध कराया । तब से दूषित हुए सद्धर्म में सुधार हुआ ।

 ११५. पांचवां संगायन


२४०० विशिष्ट विद्वान भिक्षुओं द्वारा पांचवां संगायन म्यंमा में आयोजित किया गया । तत्कालीन बर्मी नरेश मिंडोमिन के संरक्षण में और भदंत महाथेर जागराभिवंश , भदंत महाथेर नरिंदाभिधज और भदंत महाथेर सुमंगल सामी की अध्यक्षता में इस संगायन का आयोजन किया गया । इस संगायन में सारी बुद्धवाणी संगमरमर की शिला – पट्टियों पर खुदवायी गयी ताकि वह चिरस्थायी रहे ।

इस संगायन में एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी कि इसमें एक प्रकांड पंडित युवा भिक्षु भदंत आणधज सम्मिलित हुए । वे संपूर्ण बुद्धवाणी में भी पारंगत थे और पटिपत्ति में भी । आगे जाकर वे भिक्षु लैडी सयाडो के नाम से विख्यात हुए । इन्होंने एक महत्त्वपूर्ण काम यह किया कि जो विद्या केवल भिक्षुओं तक सीमित थी उसे गृहस्थों के लिए सुलभ बना दिया और सयातै जी जैसे उत्कृष्ट गृहस्थ को पारंगत कर आचार्य के पद पर स्थापित किया ।


११८. अरहंत भिक्षु लेडी सयाडो


पिछली शताब्दी में विपश्यना की शिक्षा के जाज्वल्यमान सितारे लैडी सयाडो थे । वे केवल विपश्यना के ही आचार्य नहीं थे , बल्कि बुद्धवाणी सहित समस्त पालि वाङ्मय के भी प्रकांड विद्वान थे । दे बहुत दूरदर्शी थे और इस बात को मानते थे कि प्रथम बुद्धशासन के पूरे होने के बाद द्वितीय शासन विपश्यना की कल्याणी प्रज्ञा से आरंभ होगा होगा और सारे विश्व में फैलेगा ।

विपश्यना के विशद प्रसारण के लिए उन्होंने निर्णय किया कि यह केवल निनु आचार्यों तक ही सीमित न रहे । भगवान बुद्ध के समय भिक्षु – निक्षुणियों के अतिरिक्त गृहस्थ आचार्य – आचार्याएं थीं , परंतु आगे जाकर इनकी परंपरा समाप्त हो गयी । वे इसे पुनः वापस लाये और गृहस्थों के लिए विपश्यना का दरवाजा खोल दिया ।

 ११९. छठां संगायन


यह संगायन म्यंमा के प्रधानमंत्री ऊ नू के संरक्षण में १७ मई सन १ ९ ५४ को रंगून में आयोजित हुआ । इसमें आसपास के बुद्धानुयायी देशों और म्यंमा से कुल मिला कर २५०० विद्वान भिक्षुओं ने भाग लिया । क्योंकि इस वर्ष भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के २५०० वर्ष पूरे हुए थे । तब तक मुद्रण कला प्रसिद्धि पा चुकी थी । इसलिए सारी बुद्धवाणी को , अट्ठकथाओं और टीकाओं के साथ बरमी लिपि और पालि भाषा में मुद्रित किया गया ।

१२०. गृहस्थ संत सयात जी


सयातैजी साधारण किसान के घर में जन्मे । धर्म के प्रति रुचि थी इसलिए कहीं से आनापान सीख कर अभ्यास करते रहे । भदंत लैडी सयाडो ने उन्हें न केवल विपश्यना सिखायी बल्कि इस विद्या में पारंगत करके विपश्यना का आचार्य घोषित किया । इन्होंने गृहस्थ आचार्य के रूप में एक आदर्श भूमिका निभाई । इस कारण लोगों में पूज्य हुए । सयातैजी ने एक हजार से अधिक लोगों को विपश्यना सिखायी , जिनसे केवल गृहस्थ ही नहीं बल्कि अनेक भिक्षु भी लाभान्वित हुए ।

१२१. सयाजी ऊबा खिन


आचार्य सयात जी के पश्चात पूज्य जमा खिन विपश्यना के गृहस्थ आचार्य हुए । उन्होंने केवल वर्मा के मुगानुयायी गृहस्थी को ही नहीं , बल्कि अनेक विदेशी गृहस्थों को भी विपश्यना सिखायी जिनमें बर्मा के रहने वाले प्रवासी भारतीय भी थे और बाहर से आने पाले अन्य गृहस्थ भी । उनकी यह प्रथल मान्यता थी कि जब द्वितीय बुद्धशासन का समय आरंभ होगा तब बर्मा से बुद्धवाणी और विपश्यना साधना पहले भारत जायगी और फिर यहां से सारे विश्व में फैलेगी ।


१२२. सयाजी ऊ गोयन्का एवं माताजी


सयाजी ऊ बा खिन ने अपने प्रमुख शिष्य श्री सत्यनारायण गोयन्काजी को आचार्य बनाया और उनके माध्यम से बुद्धवाणी तथा विपश्यना को भारत भेजा । कुछ समय पश्चात उन्होंने श्रीमती इलायचीदेवी गोयन्का को भी कहा कि तुम्हें भारत जाकर गोयन्काजी के साथ बहुत काम करना है ।

एक वर्ष बाद भारत आकर वे सचमुच उनके साथ इसी काम में लग गयीं । दस वर्ष पूरे होते ही ये दोनों विदेशों में विपश्यना प्रसारण के निकल पड़े । भारत की इगतपुरी नगरी में विपश्यना विशोधन विन्यास की स्थापना हुई ।

इस संस्था ने संपूर्ण पालि तिपिटक के १४० ग्रंथों को नागरी लिपि में प्रकाशित कर निःशुल्क बांटा और इन्हें सीडी – रोम में निवेशित कर विश्व की चौदह लिपियों में इंटरनेट पर भी प्रकाशित कर दिया ।

श्री गोयन्काजी के निर्देशन में विपश्यना की शिक्षा ( दिसंबर २०० ९ तक ) साठ भाषाओं में दी जा रही है और विश्वभर में अब तक १५२ स्थायी निवासीय विपश्यना केंद्रों की स्थापना हो चुकी है तथा पांच नये केंद्र निर्माणाधीन हैं । इनके अतिरिक्त विश्व के प्रमुख देशों में १० – दिवसीय केंद्रेतर निवासीय शिविर भी नियमित लगते रहते हैं ।



निष्कर्ष:


Gautam Buddha Life Stories | मैं आज अपने Sabse Bhadiya Kahaniya | Hindi Short Stories मैं पढ़ा की भगवन गौतम बुद्धा ने कैसे समाज मैं सुधर लाया वो भी कितने परिश्रम से और कितनी हे कठिन परिस्थिथि का सामना उन्होंने किया। और अपनी विपश्यना क्रिया सी लोगो के जीवन मैं कितने ही अच्छे बदलाव किये लोगो क जीवन मैं उन्होंने लोगो को सच से अवगत कराया।


तो आपको यह 22  कहानियाँ किसी लगी कृपया मुझे comment section मैं बताए तो आज ये series यही ख़तम हुई।  आपको यह पूरी series भगवन बुद्धा क बारे मैं किसी लगी मुझे जरूर बतायेगा। 

धन्यवाद 🙏

जानिए और गौतम बुद्धा के बारे मैं wikipedia पर यहाँ क्लिक करे…. Gautam Buddha Wikipedia in Hindi  

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