Best Story for Child in Hindi

Short animal stories with moral and pictures in Hindi

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Best Story for Child

चित्र स्तोत्र: Shutterstock

एक घने वन में दो शिकारी पहुंचे ।

वे पुराने शिकारी लग रहे है। देखा, वे चलते कैसे हैं ? अपने तने की दो शाखों  से। शिकार की टोह में दूर – दूर घूमे थे , लेकिन ऐसा घने वन पर ही चलते चले जाते हैं । 

” जंगल उन्हें नहीं मिला था । देखते ही दहशत सा होने लगता है। शीशम ने कहा,

” ये लोग इतने ही अच्छे रहते हैं , ऊँचे वहाँ एक बड़े पेड़ की छाँह में उन्होंने वास किया और आराम ही कर रहे है उठते ही नही । क्यों दादा ? ” 

दादा ने कहा, 

” हमारी – तुम्हारी बातें करने लगे । तरह तरह की  जो मुझे समाज नहीं आ रहा था ? इतने मैं एक ने कहा , ” ओह , कैसा भयानक जंगल है । ” इधर – उधर चलते रहते हैं , ऊपर की ओर बढ़ना उतने मैं दूसरे  न जाने  किसने कहा , ” और कितना घना हैं ! ” अरे। बिना जड़ के न जाने वे किस तरह जीते  हैं । “ 

कुछ देर बात कर विश्राम करके वे शिकारी आगे बढ़ इतने में बबूल, जिसमें हवा साफ छनकर निकल जाती गए । उनके चले जाने पर पास के शीशम के पेड़ ने बड़ दादा  से बोली, एक जगह रुकते ही नहीं यह और जिसके तन पर कटे थे वो बोला की,

बड़ दादा, अभी तुम्हारी छाँह में ये कौन थे ? बड़ ” दादा , ओ दादा , अब तुम  ही कुछ बताओ तुमने बहुत दिन देखे हैं । यह बताओ कि  वे  कहा  गए ? ” किसी वन नाम  के जीव को भी देखा है । ये  दोनों आदमी किसी भयानक घने वन के बारे मैं बात कर रहे थे ना ,बड़ ने कहा , ” आ गए तुम सब पर क्या तुम उन्हें नहीं जानते हो ? ” की वो क्या बात कर रहे थे ।

तुमने उस भयावने वन को देखा है ? “

शीशम ने कहा,

” नहीं, वे बड़े अजब मालूम होते थे ।  शीशम ने कहा , “दादा, हाँ सुना और मैंने भी देखा उने। वह कौन थे, दादा ? पहले कभी नहीं देखा उन्हें । “वन क्या होता है ? “

दादा ने कहा,

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चित्र स्तोत्र: Shutterstock

“ जब छोटा था तब इन्हें देखा था ।  बड़ दादा ने कहा, ” सच पूछो तो भाई, इतनी पता हैं की इन्हें आदमी कहते हैं । इनमें पत्ते नहीं होते, तन – ही -तन होते हैं, उस भयानक वन को तो मैंने भी नहीं देखा। सभी जानवर बड़ दादा कि बात सुन रहे थे। शेर, चीता, भालू, हाथी, भेड़िया ।

 पर कोई भी वन नहीं जानता था। आस – पास के पेड़, साल, शीशम, सिरसा ने कहा कि वन नामक जानवर को मैने अब तक नहीं देखा । ” एक ने कहा,

उस बातचीत में सब हिस्सा लेने लगे। वन को कोई भी नहीं जनता की वन कौन हैं, वह शेर – चीतों से भी डरावना होता है। ” जानते हो। किसी को उसका कुछ पता नहीं था पर बड़ दादा ने कहा , “डरावना जाने तुम किसे कहते डर सबको था ।

इतने में पास ही जो बाँस खड़ा था और जो हो कभी कमज़ोर नहीं पढ़ता था।जिसे सब प्रिय है । ” जरा हवा पर खड़ – खड़ करने लगता था, उसने अपनी जगह बबूल ने कहा , ” दादा, प्रिय की बात नहीं है । बाँस ने सीटी – सी आवाज देकर कहा,

” मुझे बताओ ! क्या हमारे पास कमर रहता है ।  तितली  ने  कहा, वो सब छोड़ो पर वे आदमी वन को भयावना बात रहे थे ? मैं  बैल हूँ। मैं बहुत कुछ जानता हूँ । “

”जरूर बह चीतों से बढ़कर होंगे ।” बड़ दादा ने गंभीर वाणी से कहा , 

“तुम तीखा बोलते  हूँ , सो तो होता ही होगा । आदमी एक टूटी – सी टहनी है । बात यह है कि बताओ , तुमने वन देखा है ? 

हम लोग से आग की लपट छोड़कर शेर – चीतों को मार देता है । उन्हें सब उसको जानना चाहते हैं । ” 

ऐसे मौते अपने सामने हमने देखा है। पर वन की लाश हमने…  बाँस ने रीती आवाज से कहा , “ मालूम होता है, हवा नहीं देखी वन कोई बड़ा खौफनाक होगा शायद । ” मेरे भीतर  जहा  कही भी  जगह  हैं हमें वन –वन –वन –वन – ही कहते हुई इसी तरह उनमें बातें होने लगी । मुझे लगता है की वन भी उनमें से कोई  एक है जो इन दोनों आदमियों की तरह घूमता रहता है , पर कही  रुकता नहीं । “

एक ने कहा कि हम सबको घास से इस विषय में पूछना चाहिए । घास हर जगह हैं यहाँ । वह कितनी व्याप्त है और ऐसी क्या हो सकता है?” बड़ दादा ने कहा ,

” तो वन नाम के जीव से कभी तुम्हारा सामना नहीं हुआ है क्या ?  बड़ ने कहा,

“वृक्ष बाबू , तुम घने बिलकुल भी नहीं हो , केवल सीधे – ही सीधे हो । पुरे भरे होते तो झुकना जानते । बड़ दादा ने उधर से आँख हटाकर फिर और लोगों से मिलाई ताकि किसी को उससे शिकायत ना हो। तब सबने घास से पूछा , ” तू वन को जानती है ? 

घास ने कहा,

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चित्र स्तोत्र: Shutterstock

 ” नहीं तो दादा , मैं उन्हें नहीं जानती । लोगों की जड़ों को ही मैं जानती हूँ । उनके फल मुझसे ऊँचे रहते हैं । पर  तल के स्पर्श से सबका परिचय मुझे मिलता है । जब मेरे सिर पर चोट ज्यादा पड़ती है, समझती हूँ यह ताकत का प्रमाण है । धीमे कदम से मालूम होता है, यह कोई दुखियारा जा रहा है । दुख से मेरी बहुत बनती है, दादा ! मैं उसी को चाहती हुई यहाँ – से – वहाँ तक बिछी रहती हूँ ।  सभी कुछ मेरे ऊपर से निकलता है । पर वन को मैने अलग करके कभी नहीं पहचाना । ” 

दादा ने कहा , ” तुम कुछ नहीं बतला सकती क्या उनसे ? “

 घास ने कहा,” मैं बेचारी क्या बतला सकती दादा । ” तब बड़ी कठिनाई हुई । बुद्धिमती घास ने जवाब दे दिया ।

 वाग्मी वंश बाबू भी कुछ न बता सके और बड़ दादा स्वयं अत्यंत जिज्ञासु थे । किसी की समझ में नहीं आया कि वन नाम के भयानक जंतु को कहाँ से कैसे जाना जाए । इतने में पशुराज सिंह वहाँ आए । बड़ दादा ने पुकारकर कहा ,“ओ सिंह भाई, तुम बड़े पराक्रमी हो । जाने कहाँ – कहाँ छापा मारते हो । एक बात तो बताओ , भाई । ” शेर ने पानी पीकर गर्व से ऊपर को देखा । दहाड़कर कहा , ” कहो , क्या कहते हो ? “ बड़ दादा ने कहा , ” हमने सुना है कि कोई वन होता है जो यहाँ आस – पास है और बड़ा भयानक है । हम तो समझते थे कि तुम सबको जीत चुके हो । उस वन से कभी तुम्हारा मुकाबला हुआ है ?

बताओ , वह कैसा होता है ? ” शेर ने दहाड़कर कहा ,” लाओ सामने वह वन , जोश  मैं हूँ अभी मैं उसे फाड़ – चीरकर न रख दूँ । मेरे सामने लाओ 

शेर ने कहा,

” सामने आते हो की नहीं वन। मैं अभी दहाड़ देता हूँ। हां अगर वन मैं दम है तो आए वह सामने । खुली चुनौती है । या वह है या मैं हूँ , ऐसा कहकर उस वीर सिंह ने वह तुमुल घोर गर्जन किया कि दिशाएँ काँपने लगी । बड़ दादा के देह के पत्ते कापने लगे । उनके शरीर के अंदर में वास करते हुए शायक ची-ची कर उठे । चूहे और जंतु उनके बिल मैं घुस गए ओर जैसे आतंक भर गया । पर वह गर्जना जारी रहा । हुंकार का उत्तर कुछ नहीं आया ।

सिंह ने उस समय गर्व से कहा ,

” तुमने यह कैसे जाना कि कोई वन  है और वह आस – पास रहता है । आप सब निर्भय रहिए कोई नहीं है , कहीं नहीं है, मैं हूँ, तब किसी और का चिंता आपको नहीं रखना चाहिए ।

” बड़ दादा ने कहा,

 ” आपकी बात सही है। मुझे यहाँ ग़लतफहमी हो गई हैं । वन होता तो दीखता अवश्य । फिर आप हो, तब कोई और क्या होगा । पर वे दो शाख पर चलने वाले जीव जो आदमी होते हैं, वे ही यहाँ मेरी छाँह में बैठकर उस वन  की बात कर रहे थे ।

ऐसा मालूम होता है कि ये बिना जड़ के आदमी हमसे ज्यादा जानते हैं ।” सिंह ने कहा,

” आदमी को मैं खूब जानता हूँ । मैं उसे खाना पसंद करता हूँ । उसका मांस मुलायम होता है लेकिन वह चालाक जीव है । उसको मुंह चीरकर खा डालूंगा, तब अच्छा होगा, नहीं तो उसका भरोसा नहीं करना चाहिए । उसकी बात – बात में धोखा है । ” बड़ दादा तो चुप रहे लेकिन औरों ने कहा कि,

सिंहराज, तुम्हारे भय से बहुत – से जंतु छिपकर रहते हैं । वे मुंह नहीं दिखाते । वन भी शायद छिपकर रहता हो । तुम्हारा दबदबा कोई कम तो नहीं है । इससे जो साँप धरती में मुंह गाड़कर रहता है, ऐसी भेद की बातें उससे पूछनी चाहिए । रहस्य कोई जानता होगा तो अंधेरे में मुंह गड़कर रहने वाला साँप जैसा जानवर ही जानता होगा । हम पेड़ तो उजाले में सिर उठाए खड़े रहते हैं । इसलिए हम बेचारे क्या जानें ।

शेर ने कहा,

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चित्र स्तोत्र: Shutterstock

” जो मैं कहता हूं , वही सच है । उसमें शक करने की हिम्मत ठीक नहीं है। जब तक मैं हूँ , कोई न डरा करो । और साँप क्या कोई मुझसे ज्यादा जानता है ? “

बड़ दादा यह सुनकर भी कुछ नहीं बोले । औरों ने भी कुछ नहीं कहा । बबूल के कॉट जरूर उस वक्त तनकर कुछ वहाँ से चला गया । पक्षी आए थे लेकिन फिर भी बचूल ने धीरज नहीं छोड़ा और वही था। अज्ञानी कोई नहीं था। पर वन का जानकार कोई नहीं किसी ने मुँह नहीं खोला ।

अंत में जम्हाई लेकर मंथर गति से सिंह लेकर जा रहा था । ऐसी चर्चा हुई , ऐसी चर्चा हुई कि विद्याओं पर बिट्याएं उसमें से प्रस्तुत हो गई । अंत में तय हो पाया कि दो टाँगोंवाला वन की बात करने वाले  झूट – मुठ की बाते करते हैं और आदमी ईमानदार जीव नहीं है । उसने तभी वन की बात में से जाते हुए दीख गए चमकीले देह के नागराज । बबूल की बनाकर कह दी है । वह वन गया है । सच में वह नहीं है । उस निश्चय के समय बड़ दादा ने कहा ,

” भाइयो, मेरी निगाह तीखी थी, झट से बोला,” दादा ओ बड़ दादा,

वह जा रहे हैं सर्पराज । ज्ञानी जीव हैं । मेरा तो मन हैं की उनके सामने आदमियों को फिर आने दो । इस बार साफ – साफ उनसे सच खुल सकता है । आप पूछो तो जरा कि वन का पता पूछना कहा हैं, वन क्या है ? बताएँ तो बताएं , नहीं तो ठिकाना क्या उन्होंने देखा है ? “ खामख्वाह झूठ बोलना छोड़ दें । लेकिन उनसे पूछने से बड़ दादा शाम  मैं मौन हो जाते हैं । यह उनकी पहले उस वन से दुश्मनी ठानना हमारे लिए ठीक नहीं है ।

पुरानी आदत है। बोले,” संध्या आ रही है । इस समय यह  भय हो रहा हैं । जाने वह और क्या हो । ” बात नहीं चीत नहीं करनी चाहिए । लेकिन बड़ दादा की वहाँ विशेष चली नहीं । जवानों बबूल झक्की ठहरे । बोले ,

” बड़ दादा, साँप ने धरती से कहा कि, ये बड़े हैं, उनके मन में तो डर बैठा है और जंगल इतना चिपटकर रहते हैं कि सौभाग्य से हमारी आँखें उनपर न होने का फैसला पास हो गया । वर्ण देखिए न , कैसा चमकता है । यह सर्प एक रोज आफत के मारे फिर वे शिकारी उस जगह अतिशय श्याम है ।

इससे उतने ही ज्ञानी होंगे । अवसर खोना जाए। उनका आना था कि जंगल जाग उठे । बहुत काम आदमी आते हैं यहाँ । इनसे कुछ रहस्य पा लेना चाहिए । ” जीव – जंतु , झाड़ी – पेड़ तरह – तरह की बोली बोलकर बड़दादा ने तब गंभीर वाणी से सांप को रोककर अपना विरोध दरसाने लगे । आदमी बेचारों को अपनी जान प्यारी हैं ” हे नाग , हमें बताओ कि वन का वास कहाँ है ?

और वह का संकट उन दो आदमियों को मालूम होने लगा । उन्होंने अपनी बंदूकें संभाली । पूछा क्या है ? ” साँप ने साश्चर्य कहा ,

” किसका बास?

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चित्र स्तोत्र: Shutterstock

बड़  दादा ने बीच में पड़कर कहा , ” अरे, तुम लोग वह कौन जंतु है ? और उसका वास पाताल लोक तो कहीं नहीं अरे अधीर क्यों होते हो ? इन आदमियों के खतम हो जाने से नहीं । ” हमारा तुम्हारा फैसला नहीं नहीं पता चलेगा। जोर देते हुए बड़ दादा ने कहा –

” हम उसके संबंध में कुछ बताओ। गुस्से से कहीं ज्ञान हासिल होता है ? मैं खुद निपटारा नहीं जानते । तुमसे जानने की आशा रखते हैं । जहाँ जगदा किए देता हूँ । ” यह कहकर बड़ दादा आदमियों को छिद्र हो , वहाँ तुम्हारा प्रवेश है ।

टेदा – मेढ़ापन बाहर मुखातिब करके बोले , “ भाई आदमियो, हम इतने ज्ञानी नहीं  है । इसीलिए तुमसे पूछा है । ” बंदूकों का मुंह नीचा करके रखो जीब मैं आग भरकर साँप ने कहा , ” मैं धरती के सारे गर्न जानता हूँ । वहाँ रहता हूँ । डरो मत । अब यह बताओ कि वह वन क्या है ज्ञान की खान है ?तुमको अब क्या बताऊँ । तुम नहीं जिसकी तुम बात किया करते हो ? बताओ , वह कहाँ है ? ” समझोगे । तुम्हारा वन , लेकिन कोई गहराई की सच्चाई नहीं आदमियों ने अभय पाकर अपनी बंदूकें नीची कर ली  है ।

वह कोई बनावटी सतह की चीज थोड़ी है। हँसा और कहा , ” यह वन ही तो है जहाँ हम सब हैं । ” ऊपरी और उथली बातों से वास्ता नहीं रहता । ” उनका इतना कहना था कि ची – धी – की – की सवाल बड़ दादा ने कहना चाहा कि ‘ तो वन … ‘ साँप ने पर सवाल किया । कहा , ” वह फर्जी है । “

यह कहकर वह आगे बढ़ गए । ” वन यहाँ कहाँ है ? कहीं नहीं है । ” मतलब यह है कि जीव – जंतु और पेड़ – पौधे आपस में ” तुम हो । मैं हूँ । वह है । वन फिर हो कहाँ सकता मिले और पूछ – ताछ करने लगे कि वन को कौन जानता है है ? ” वह कहाँ है , क्या है ?  सबको ही अपना – अपना ज्ञान ” तुम झूठे हो । “

” धोखेबाज ” इस तरह  ऐसा शोर मचा कि उन बेचारे आदमियों की ” स्वार्थी । अकल गुम होने को आ गई । बड़ दादा न हो तो आदमियों ” खतम करो इनको इनका काम तमाम करो ”! । आदमी यह देखकर डर गए । बंदूकें संभालना चाहते उस समय आदमी और बड़ दादा में कुछ ऐसी धीमी बात हुई और मामला संभाला और पूछा,

” सुनो धीमी बातचीत हुई कि वह कोई सुन नहीं सका । बातचीत आदमियों , तुम झूठे साचित होंगे तभी तुम्हें मारा जाएगा के बाद पुरुष उस विशाल बड़ के वृक्ष के उपर चढ़ता दिखाई और अगर झूठे नहीं हो तो बताओ वन कहाँ है ? “ दिया । वहाँ दो नये – नये पत्तों की जोड़ी खुले आसमान की उन दोनों आदमियों में से प्रमुख ने विस्मय से और भय तरफ मुस्कराती हुई देख रही थी । आदमी ने उन दोनों से कहा ” हम सब जहाँ है वहीं तो वन है । ” बड़े प्रेम से पुचकारा । पुचकारते समय ऐसा मालूम हुआ बबूल ने अपने काँटे खड़े करके कहा , ” चको मत , . जैसा मंत्र रूप में उन्हें कुछ संदेश भी दिया है ।

बह सेहमेटे है, वह सिरस है, वह साल है, वह पास है , वह वन के प्राणी यह सब कुछ स्तब्ध भाव से देख रहे थे । हमारे सिंहराज है, वह पानी है , वह घरती है । तुम जिनकी उन्हें कुछ समझ में न आ रहा था । देखते – देखते पत्तों की छोह में हो, यह हमारे बड़  दादा है ।

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तब तुम्हारा वन कहाँ वह जोड़ी उग्रीव हुई । मानो उनमें चैतन्य भर आया । उन्होंने है ? दिखाते क्यों नहीं ? तुम हमको धोखा नहीं दे सकते । “ अपने आस – पास और नीचे देखा जाने उन्हें क्या दिखा कि प्रमुख पुरुष ने कहा ,

” यह सब कुछ ही वन है । ” वे काँपने लगे । उनके तन में लालिमा व्याप गई । कुछ क्षण इसपर गुस्से में भरे हुए कई जानवरों ने कहा, ” बात से बाद मानो ये एक चमक से चमके । जैसे उन्होंने खंड को बचो नहीं , ठीक बताओ , नहीं तो तुम्हारी खेर नहीं है । ” कुल में देख लिया कि कुल है, खंड कहाँ है । अब आदमी क्या कहें , परिस्थिति देखकर ये बेचारे वह आदमी अब नीचे उतर आया था और वनचरों के जान से निराश होने लगे । अपनी मानवी बोली ( अब तक समका खड़ा था ।

बड़  दादा ऐसे स्थिर – शांत थे, मानो प्राकृतिक बोली ) एक ने कहा , ” यार ! कह योगमन हो कि सहसा उनकी समाधि टूटी । ये जागे । मानो क्यों नहीं देते कि बन नहीं है । देखते नहीं , किनसे पाला पड़ा उन्हें अपने चरमशीर्ष से कोई अनुभूति प्राप्त हुई हो । 
 ” दूसरे ने कहा,

” मुझसे तो कहा नहीं जाएगा । ” उस समय सब ओर सप्रश्न मौन व्याप्त था । उसे भम ” तो क्या मरोगे ? ” करते हुए बह दादा ने कहा “ सदा कौन जीया है । इसमें न भोले प्राणियों को भुताचे में कैसे रव करकर वह चुप हो गए ।

माथियों ने दादा को संबोधित वह कहकर प्रमुख पुरुष ने सबसे कहा , ” भाइयो, कन करते हुए कहा , ” दादा दादा ” , वन दूर या बाहर नहीं है । आप लोग सभी वन  हो । “ इसपर दादा ने इतना ही कहा – फिर गोलियों – सी सवालों की बौछार अपर पड़ने लगी । ” यह है , वह है । ” ” स्या कहा ? में वन  हूँ ? तब सबूत दो ! ” 

” क्या मैं यह मानूं कि में बांस नहीं , वन हूँ । मेरा ” सब कही है । सब की है । रोम – रोम करता है , मैं बाँग हूँ ” और धाम ” और शेर । ” ” और मैं सोप ।

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