7+ Jeevan Jine ke Niyam | Ultimate Hindi Gyan

Jeevan Jeena Sikho | Gazab Hindi Knowledge

इंट्रोडक्शन: नमस्कार दोस्तों Sabse Bhadiya Kahaniya | Hindi Short Stories मैं आप सबका स्वागत हैं मेरा पिछले पोस्ट Next Level Ka Hindi Motivational Thoughts | For Students आप सबने बोहोत पसंद किया था।

इसीलिए उसे जुडी एक पोस्ट मैं आज लेकर आया हूँ। इसका THEME है Sukhi jeevan jeene ka tarika

हम सभी को duniya mein jeene ka tarika तो पता हैं लेकिन हम मैं से आधे लोगो को jindagi jine ke niyam नहीं पता Zindagi jeene ke do hi tarike (in hindi) या तो अच्छे से जियो यह फिर बुरे तरीके से जियो। 

1. शरीर में मूल तत्वों का और आत्मा में मूल गुणों का स्तर (Level of basic elements in the body and basic properties in the soul)

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Jeevan Kaise Jeena chahiye in Hindi 
वास्तव में शरीरको धारण करनेवाली और छोड़देने वाली आत्माहै । आत्मा अदृश्यहै, उसे एकान्तमें, अन्तर्मुखी होकरअनुभव किया जासकता है शरीर तो दृश्यमान है यानी कि दिखाई देता है। जो पाँचतत्वों से मिलकरबना है

इन तत्वों का शरीर निर्माण में निश्चित अनुपात है जैसे पानी 67 प्रतिशत और पृथ्वी 33 प्रतिशत है  हवा, अग्नि और आकाश का वजन भले ही मापा नहीं जा सकता परन्तु इनका भी निर्धारित अनुपात रहता है

किसी भी तत्व की मात्रा यदि कम हो जाये या बढ़ जाये तो शारीरिक बेचैनी का कारण बनती है शरीर को चलाने वाली अदृश्य आत्मा में भी मूल रूप से सात गुण विद्यमान हैं जिन्हें वह ईश्वरीय देन के रूप में अपने साथ लेकर आती है

इन सात गुणों ( ज्ञान, पवित्रता, शान्ति, प्रेम, सुख, आनन्द, शक्ति ) में से किसी एक का भी स्तर कम होने पर आत्मा भी बेचैनी का अनुभव करती है

2. शरीर के मूल तत्वों की पूर्ति (Fulfillment of the basic elements of the body and Life)


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Jeevan Jeene ka Tarika 
Example के लिए , हमने बहुत शारीरिक श्रम किया और शरीर में पृथ्वी तत्व का उपभोग होकर उसका स्तर पूर्ति हो जाए
इसी प्रकार , हमने खूब दौड़ लगाई , पसीना आया और शरीर में जल तत्व का उपयोग होकर उसका स्तर नीचे गया तो हमें खूब प्यास लगती है फिर हम पानी पीते है परन्तु कितना ?
उतना ही जितने से जल तत्व का निर्धारित अनुपात पूरा हो जाए यही बात अग्नि, हवा, आकाश आदि तत्वों पर भी लागू होती है

3. जरूरत है शान्ति की कमी की ( Lack of peace)


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Jindagi Jine ke Niyam 
 

जैसे शरीर की शक्ति कर्म में लगती है और फिर उसकी पूर्ति करनी पड़ती है , इसी प्रकार आत्मा की शक्तियों या गुणों का स्तर भी कर्म में आने पर नीचे चला जाता है जिसकी पूर्ति करनी अति आवश्यक होती है

जैसे मान लीजिए , हम किसी ऐसे माहौल में कर्म कर रहे हैं जहाँ शोरगुल है , नकारात्मक वातावरण है कोई अपशब्द या अपमानजनक शब्द प्रयोग कर रहा है , हम पर इल्जाम लगाया जा रहा है या संशयात्मक नजरों से देखा जा रहा है

हमारी उचित बात को भी ठुकराया जा रहा है या पक्षपात किया जा रहा है इस प्रकार के वातावरण में रहने से आत्मा का शान्ति का स्तर काफी नीचे जाता है

जैसे पानी का स्तर नीचे आने पर हम पानी की मांग करते हैं इसी प्रकार फिर आत्मा भी बारबार शान्ति की मांग करती है अन्दर से आवाज आती है , शान्ति चाहिए , कहीं शान्ति के स्थान पर जाना चाहिए , शान्ति के माहौल की सख्त जरूरत है आदि आदि

प्यास लगने पर पानी तो हर जगह सुलभ है परन्तु शान्ति इतनी आसानी से सुलभ नहीं हो पाती शान्ति की कोई प्याऊ है , आर.. , बोतल में बिकती है , नदी , कुएँ , तालाबों में बहती है यदि मुनष्य मंदिर में जाता है तो वहाँ भी अल्पकाल की शान्ति मिलती है
जब तक वहाँ बैठा है , शान्ति है , बाहर निकलते ही अशान्ति पुनः घेर लेती है यह तो ऐसे ही है कि जब तक डॉक्टर की दुकान में रहे , खाँसी ठीक रही , पर आए तो पुन : चालू हो गई परन्तु दवा तो ऐसी चाहिए कि घर में भी खाँसी आए
तो हम पुनः उस बात पर आते है कि शान्ति का यह स्तर कैसे प्राप्त हो अन्दर से बारबार शान्ति की मांग उठ रही है और पूर्ति का कोई साधन दिख नहीं रहा है तो क्या किया जाए ?

4. शान्ति की मांग दबाई जाती है , पूर्ण नहीं की जाती (Demand for peace is suppressed, not fulfilled)


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SHANTI KI MANG

Shanti ki mang kariye
ऐसे में व्यक्ति बहुधा भौतिक साधनों में शान्ति खोजना चाहता है

किसी मित्र से वार्तालाप करके , किसी से सोशल मीडिया पर चैट करके , कोईटी.वी.शो देखके , बाजार में शॉपिंग करके , मनपसन्द भोजन खाकर या अन्य इसी प्रकार के साधनों द्वारा शान्ति की मांग को तृप्त करना चाहता है

परन्तु इनमें से कोई चीज शान्ति के स्तर को पूर्ण नहीं करा पाती , हाँ , कुछ देर के लिए भीतर की आवाज को दबा देती है

उधर से ध्यान हटा देती है या उसे भुला देती है। दिन तो इस प्रकार बीत जाता है परन्तु जैसे ही व्यक्ति रात्रि के एकान्त में जाता है , शान्ति की वह प्यास पुनः जाग उठती है शान्ति की कमी बेचैन करने लगती है

चिन्ता करते , खालीपन को झेलते , करवटे बदलते आधी रात या कभी तो सारी रात भी गुजर जाती है शान्ति से खाली हुई जगह को कोई भी भौतिक प्रयास भर नहीं पाता है फिर व्यक्ति को एकान्त से भी डर लगने लगता है

क्योंकि लोगों की भीड़ में , भीतर की जो मांग दबी रहती है वह एकान्त में जागकर पीड़ा को बढ़ा देती है इसका समाधान क्या है


5. समाधान है राजयोगी (The solution is Raja Yogi)

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Khushal Jeevan Jeene ke Tarike

जीवनशैली में इसका समाधान है राजयोग राजयोग एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसमें शरीर और आत्मा दोनों का सन्तुलित पोषण होता है

इसमें हम शरीर को स्वस्थ रखने के साथ आत्मा को भी स्वस्थ रख पाते है शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ आत्मा की आवश्यकताओं को भी पूर्ति कर पाते है

राजयोग में हम जान जाते है कि जैसे प्रतिदिन शरीर को भोजन , मोबाइल को चार्जिंग , गाड़ी में पेट्रोल जरूरी है उसी प्रकार आत्मा की भी charging जरूरी है

आत्मा का चार्जर है परमपिता परमात्मा आत्मा में शान्ति का जो लेवल कम हुआ है वो पिता परमात्मा से जुड़कर ही पूर्ण हो सकता है

जैसे खेत को यदि कुएँ से जोड़ दिया जाए तो उसमें पानी भर जाता है इसी प्रकार आत्मा को परमात्मा से जोड़ दिया जाए तो उसमें भी शान्ति भर सकती है

जोड़ने के लिए सबसे पहले देह से न्यारा होकर आत्म चेतना में बैठने की आवश्यकता है आत्म चेतना में स्थित होकर हम परमात्मा पिता को उनके घर परमधाम मे याद करते हैं तो उनकी शान्ति की किरणें आत्मा में भरने लगती हैं

प्रारम्भ में यह अभ्यास हमें यह मदद करता है कि शान्ति का जो स्तर कम हुआ है , हम उसे भर पाते है अगले कदम में हमारी यह मदद करता है कि उस नकारात्मक वातावरण का हम पर बुरा प्रभाव ही ना पड़े हम शान्ति के स्तर पर वार होने ही ना दें

परमात्मा से निरन्तर जुड़ाव से भरपूरता बनी ही रहे तीसरे कदम में हम इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि हमारी आन्तरिक शान्ति के प्रकम्पनों से वो नकारात्मक वातावरण हो धीरेधीरे बदल कर हमारे अनुकूल होने लगता है इस प्रकार , राजयोगी जीवन शैली आत्मा को अन्दर से सशक्त करती है

6. हम बन जाते हैं वातावरण के रचयिता (We act as we are the creator of the environment)

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Jeevan jiyo
यह बात केवल शान्ति के गुण के लिए नहीं बल्कि आत्मा के अन्य सभी गुणों पर भी लागू होती है मान लीजिए , हम किसी ऐसे माहौल में रह रहे है जहाँ आपसी प्रेम नहीं है , नफरत है , तिरस्कार है , दुत्कार है ऐसे में आत्मा में प्रेम का स्तर कम हो जाता है

इस स्तर की पूर्ति को यदि वह भौतिक वस्तु या व्यक्तियों में खोजती है तो अल्पकालिक राहत मिलती है क्योकि वस्तुएँ तो जड़ है , उनमें प्रेम होता नहीं है और व्यक्ति स्वार्थी और कमजोर है , उनके प्रेम में स्थायित्व नहीं है

अगर प्रेम का यह स्तर पूर्ण किया जाए तो अन्दर बचैनी बनी रहती है इसलिए जैसे आत्मा का कनेक्शन परमात्मा से जोड़कर हमने शान्ति का स्तर पूर्ण किया , ऐसे ही प्रेम का भी कर सकते हैं यहाँ भी हमारे इस प्रयास के तीन कदम हैं
पहले कदम में हम प्रेम के स्तर में आई कमी को परमात्म प्यार से भरते हैं दूसरे कदम में हम कमी को आने ही नहीं देते अर्थात् परमात्मा के प्रेम के गहरे अहसास में डूबे रहकर उस वातावरण से अप्रभावित हो जाते हैं
और तीसरे कदम में हम परमात्म प्रेम के दाता बन उस वातावरण को ही परिवर्तित कर सर्व के अनुकूल बना देते हैं
यही अभ्यास अन्य आत्मिक गुणों जैसे पवित्रता , आनन्द शक्ति आदि के लिए भी अपनाना है इससे हम वातावरण के अधीन रहकर उसे अपने अनुसार रचने वाले बन जाते हैं

7. आध्यात्मिक शून्यता (Spiritual Emptiness)

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Adhayatmik Baniye
हम जानते हैं , आज के समय में बहुत सारी : बीमारियाँ मनोकायिक ( Psycho – somatic ) हैं ये पहले आत्मा में आती हैं और बाद में इनके लक्षण शरीर में प्रकट होते हैं आत्मा में आने वाली बीमारी वास्तव में , आत्मा के निहित गुणों के स्तर का कम होना ही है

पी.जी.आई. चण्डीगढ़ के मानद प्राध्यापक डॉ.एन.एन. वीग कहते हैं , ‘ आधुनिक जीवनशैली से प्राप्त सभी बीमारियाँ आध्यात्मिक शून्यता ( Spritual Vaccum ) के कारण होती हैं यह शून्यता , विवेक शून्यता को जन्म देती है जिसमें मनुष्य की सारअसार को परखने की शक्ति नष्ट हो जाती है

जैसे कि शरीर में मिनरल , विटामिन्स , कैल्शियम के मूल स्तर के कम होने से कहीं दर्द या चक्कर या कमजोरी आदि होने लगते हैं

इसी प्रकार , आत्मा यदि छह महीने तक लगातार मूल गुणों की कमी को झेलती रहे तो सातवें मास अवश्य ही किसी घातक बीमारी के लक्षण शरीर में प्रकट होने लगते हैं , ऐसा वैज्ञानिक शोध बताती हैं

फिर इनके इलाज के लिए हम गोलियों के रूप में जो केमिकल्स लेते हैं , वे आत्मा तक तो नहीं पहुँच पाते , मूल कमी की पूर्ति तो नहीं कर पाते , हाँ , उभरे हुए लक्षणों को दबाकर अपने सहप्रभाव से कुछ नई बीमारियों को अवश्य प्रकट कर देते हैं

बीमारियों को दबाने और उभारने के इस क्रम में कितनी ही नईनई बीमारियाँ रोज प्रकट हो रही हैं इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि हम अन्तर्मुखी बन आत्मा के मूल गुणों को अनुभव करें

उन्हें बारबार अनुभव करना ही उन्हें बढ़ाना है यदि हम उन्हें बारबार अनुभव नहीं करते , तो वे सुषुप्त हो जाते हैं और हम उन्हें बाहरी जगत में ढूँढ़ने की नाकाम कोशिश करने लगते हैं

ऐसी निराशाहताशा से बचने का एकमात्र उपाय है प्रतिदिन कुछ घड़ियाँ निकाल कर अपने आत्मस्वरूप को देखना , अपने से बातें करना , अपने एकएक मूल गुण का चिन्तन करना , उसकी अनुभूति में डूबना , उसके प्रकम्पन फैलाना आदिआदि
इस अभ्यास के दौरान परमात्मा पिता के गुणों से हमारा मेल होकर सोने में सुहागा हो जाएगा और हम अन्दर से भरपूर , शरीर से स्वस्थ और स्वभाव से सकारात्मक होकर आनन्दमय जीवन व्यतीत कर पाएंगे

Conclusion:
तो आशा करता हूँ आपको हमारी वेबसाइट Sabse Bhadiya Kahaniya | Short Hindi Stories का यह पोस्ट zindagi jeene ka tarika पसंद आया होगा ऐसी ही कहानियाँ, कविता और हिंदी ज्ञान पढ़ने के लिए हमारे Newsletter को Subscribe करे।
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